
Report By: Kiran Prakash Singh
चीन दौरे से लौटे डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। होर्मुज स्ट्रेट पर भी अमेरिका का बड़ा दावा।
ईरान पर अमेरिका-चीन एकमत? ट्रंप के बयान से बढ़ी हलचल
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने चीन दौरे से लौटने के बाद ईरान, होर्मुज स्ट्रेट और ताइवान को लेकर कई बड़े बयान दिए हैं। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका और चीन दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट को हर हाल में खुला रखना जरूरी है क्योंकि यह वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग है।
ट्रंप के इन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। खासतौर पर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और ईरान को लेकर अमेरिका की नीति फिर सख्त होती दिखाई दे रही है।
चीन दौरे के बाद ट्रंप का बड़ा दावा
तीन दिन के सरकारी दौरे पर चीन पहुंचे ट्रंप ने वहां चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच ईरान, ताइवान, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
चीन से लौटते समय एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और चीन इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इस मुद्दे पर बेहद सख्त रुख अपनाया।
ट्रंप ने कहा, “राष्ट्रपति शी ने साफ शब्दों में कहा कि ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार नहीं हो सकते। हम दोनों इस बात पर एकमत हैं।”
होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका का बड़ा दावा
ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने दावा किया कि फिलहाल इस क्षेत्र पर अमेरिका का नियंत्रण बना हुआ है और अमेरिकी नौसेना की कार्रवाई के कारण ईरान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उनके मुताबिक पिछले ढाई हफ्तों में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी की वजह से ईरान को हर दिन लगभग 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर पड़ सकता है।
ताइवान मुद्दे पर भी हुई अहम चर्चा
ट्रंप ने अपनी बातचीत में ताइवान मुद्दे का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग ताइवान में किसी तरह का युद्ध या स्वतंत्रता आंदोलन नहीं चाहते क्योंकि इससे बड़ा क्षेत्रीय संघर्ष पैदा हो सकता है।
हालांकि ट्रंप ने इस मुद्दे पर अपनी ओर से ज्यादा टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि उन्होंने चीन की चिंताओं को ध्यान से सुना है। उन्होंने यह भी बताया कि ताइवान को हथियारों की बिक्री के मुद्दे पर भी दोनों नेताओं के बीच चर्चा हुई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका और चीन के बीच ताइवान सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बना हुआ है। ऐसे में ट्रंप का यह बयान दोनों देशों के रिश्तों को लेकर अहम संकेत माना जा रहा है।
पुराने समझौते पर ट्रंप की नई सोच
पत्रकारों ने ट्रंप से 1982 के उस समझौते को लेकर सवाल किया जिसमें अमेरिका ने कहा था कि वह ताइवान को हथियार बेचने के फैसले में चीन से सलाह नहीं लेगा। इस पर ट्रंप ने कहा कि वह समझौता अब काफी पुराना हो चुका है और मौजूदा हालात अलग हैं।
उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और अमेरिका को अपने फैसले वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से लेने होंगे। ट्रंप ने यह भी साफ किया कि अंतिम निर्णय वही करेंगे और अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा।
बड़े युद्ध से बचना चाहता है अमेरिका
ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका फिलहाल किसी बड़े विदेशी युद्ध में नहीं पड़ना चाहता। उन्होंने कहा कि हजारों मील दूर किसी नए संघर्ष में शामिल होना अमेरिका के हित में नहीं होगा।
उनके मुताबिक इस समय सबसे जरूरी चीज शांति और स्थिरता बनाए रखना है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिए कि अगर जरूरत पड़ी तो अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।
ट्रंप के बयान ऐसे समय में आए हैं जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और ईरान को लेकर अमेरिका की रणनीति दुनिया भर की नजरों में बनी हुई है।