
Report By: Kiran Prakash Singh
सुप्रीम कोर्ट की बीजेपी को फटकार: “राजनीतिक लड़ाई के लिए अदालत का इस्तेमाल न करें”
नई दिल्ली (DigitalLiveNews)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा दायर मानहानि याचिका को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि राजनीतिक मतभेदों को अदालत में लाकर न्यायपालिका को “राजनीति का अखाड़ा” बनाना अनुचित है।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अनुपस्थिति में, न्यायमूर्ति बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ — जिसमें न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर भी शामिल थे — ने बीजेपी की याचिका को खारिज करते हुए कहा, “अगर आप नेता हैं, तो आपकी चमड़ी मोटी होनी चाहिए।”
क्या है मामला?
मामला मई 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार से जुड़ा है, जब रेवंत रेड्डी ने एक चुनावी भाषण में कथित तौर पर बीजेपी के खिलाफ अपमानजनक और भड़काऊ बयान दिए थे। तेलंगाना बीजेपी के महासचिव ने रेड्डी के खिलाफ हैदराबाद की एक निचली अदालत में आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि रेड्डी ने यह कहकर बीजेपी की छवि को नुकसान पहुंचाया कि “अगर बीजेपी सत्ता में आई, तो वह आरक्षण खत्म कर देगी।” बीजेपी ने इसे जानबूझकर फैलाई गई भ्रामक और अपमानजनक राजनीतिक कहानी बताया, जिसका उद्देश्य मतदाताओं को गुमराह करना था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
रेवंत रेड्डी ने निचली अदालत के आदेश को तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 1 अगस्त 2024 को सुनवाई करते हुए रेड्डी की याचिका को स्वीकार कर लिया और निचली अदालत की कार्यवाही को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा, “जहां राजनीतिक भाषणों का प्रश्न हो, वहां मानहानि के आरोपों की सीमा कहीं अधिक ऊंची होनी चाहिए। राजनीतिक बयान अक्सर अतिशयोक्तिपूर्ण होते हैं। ऐसे में उन पर आपराधिक मानहानि का मामला बनाना उचित नहीं।”
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
बीजेपी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने दखल देने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि यह मामला अदालत में सुनवाई के योग्य नहीं है और राजनीतिक मसलों को न्यायपालिका में घसीटना ठीक नहीं।
पीठ ने टिप्पणी की, “हम बार-बार कह रहे हैं कि इस अदालत का इस्तेमाल राजनीतिक लड़ाई के लिए न करें। राजनीति का अखाड़ा सड़क और संसद है, न कि कोर्टरूम। नेताओं को आलोचना सहने की आदत डालनी चाहिए।”
क्या मानहानि के दायरे में आते हैं राजनीतिक भाषण?
यह मामला एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ले आया है कि क्या राजनीतिक भाषणों को आपराधिक मानहानि के दायरे में लाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने यह स्पष्ट किया कि चुनावी राजनीति में तीखे बयान आम हैं और हर अपमानजनक बयान को आपराधिक मानहानि नहीं माना जा सकता।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय राजनीति में न्यायपालिका की भूमिका को लेकर एक स्पष्ट संदेश देता है — राजनीतिक दलों को अपने मतभेदों को राजनीतिक मंच पर ही सुलझाना चाहिए। कोर्ट को राजनीति का माध्यम बनाना न केवल न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग है, बल्कि इससे लोकतंत्र की मूल भावना को भी ठेस पहुंचती है।
बीजेपी की याचिका खारिज होने के साथ ही यह मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया है, लेकिन इससे उठे सवाल — जैसे राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमा, नेताओं की जवाबदेही और अदालतों का दायरा — आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बने रहेंगे।