
Report By: Kiran Prakash Singh
117 साल बाद फिर सामने आएगा ‘दरिया-ए-नूर’? – हीरे की कहानी जो राजा-नवाबों से होते हुए बांग्लादेश की तिजोरी तक पहुंची
नई दिल्ली, (digitallivenews)।
जब भी दुनिया के सबसे बेशकीमती और ऐतिहासिक हीरों की बात होती है, तो ‘कोहिनूर’ का नाम सबसे पहले जुबां पर आता है। लेकिन कोहिनूर की ही तरह एक और हीरा है – ‘दरिया-ए-नूर’, जिसका नाम भले ही आज कम सुना जाता हो, लेकिन इसका इतिहास शानदार, रहस्यमयी और सत्ता के उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। अब यह हीरा एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि बांग्लादेश सरकार ने आर्थिक संकट से जूझते हुए उस बैंक तिजोरी को खोलने का फैसला किया है, जिसमें यह बेशकीमती रत्न 117 साल से बंद है।
दरिया-ए-नूर: नाम ही है कहानी
‘दरिया-ए-नूर’ का मतलब होता है – “रोशनी का समुंदर”। यह नाम इसके गुलाबी आभा और अद्भुत चमक के कारण दिया गया था। ऐसा कहा जाता है कि यह हीरा दुनिया में पाए जाने वाले सबसे बड़े और बेहतरीन गुलाबी हीरों में से एक है।
कहां से आया यह हीरा?
दरिया-ए-नूर की कहानी की शुरुआत होती है भारत की ऐतिहासिक गोलकुंडा की खदानों से। यही वो जगह है जहां से कोहिनूर भी निकला था। इस हीरे की खनन के बाद यह कई वर्षों तक मराठा शासकों के पास रहा। इसके बाद इसे हैदराबाद के नवाबी शाही परिवार ने लगभग 1.30 लाख रुपये में खरीदा।
इसके बाद इसकी यात्रा और भी दिलचस्प हो जाती है। दरिया-ए-नूर फारसी सम्राटों के पास पहुंच गया, और फिर महाराजा रणजीत सिंह (1780–1839) ने इसे जब्त कर लिया। रणजीत सिंह ने कोहिनूर और दरिया-ए-नूर दोनों को अपने खजाने का हिस्सा बनाया।
अंग्रेजों के हाथों लंदन तक
1849 में जब अंग्रेजों ने पंजाब पर कब्जा किया, तब उन्होंने रणजीत सिंह का खजाना भी अपने अधीन कर लिया। 1850 में कोहिनूर और दरिया-ए-नूर को महारानी विक्टोरिया को भेंट के तौर पर लंदन भेज दिया गया। हालांकि कोहिनूर आज ब्रिटेन के शाही ताज में जड़ा हुआ है, पर दरिया-ए-नूर का सफर वहीं नहीं रुका।
ढाका के नवाब और बंधक बना दिया गया हीरा
ढाका के पहले नवाब ख्वाजा अलीमुल्लाह ने नीलामी में इस हीरे को खरीदा। यह ब्रिटिश काल का समय था। 1908 में उनके उत्तराधिकारी नवाब सलीमुल्लाह को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक बैंकों से 14 लाख टका कर्ज लिया। इसके बदले उन्होंने दरिया-ए-नूर समेत 109 बेशकीमती वस्तुएं गिरवी रख दीं।
कर्ज चुका पाने में विफल रहने के कारण, हीरा बांग्लादेश के सरकारी बैंकों के अधीन चला गया और ढाका की एक तिजोरी में बंद कर दिया गया, जहां से वह आज तक बाहर नहीं आया।
वजन और आकार: अब भी रहस्य
1908 के अदालती दस्तावेजों में इस हीरे के वजन को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। कुछ रिपोर्टों में इसे 182 कैरेट, तो कुछ जगहों पर 26 कैरेट बताया गया है। बांग्लादेश ऑन रिकॉर्ड नामक डिजिटल संग्रह संस्था के मुताबिक, इसे सोने के बाजूबंद में जड़ा गया था और उसके चारों ओर 10 छोटे हीरे भी लगे हुए थे। इसकी बनावट, कट और चमक इसे दुनिया के अनमोल रत्नों में एक बनाती है।
अब तिजोरी खुलेगी?
बांग्लादेश सरकार, जो इस समय गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रही है, अब उन बेशकीमती ऐतिहासिक रत्नों और गहनों की तिजोरी खोलने पर विचार कर रही है जो दशकों से अनदेखे पड़े हैं। इस तिजोरी में दरिया-ए-नूर के साथ कई और मूल्यवान धरोहरें हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह हीरा वास्तव में सुरक्षित अवस्था में पाया जाता है, तो यह बांग्लादेश के लिए न केवल आर्थिक बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी ऐतिहासिक क्षण होगा।
निष्कर्ष: रोशनी के समुंदर की वापसी?
‘दरिया-ए-नूर’ महज एक हीरा नहीं, भारत, फारस, ब्रिटेन और बांग्लादेश की साझा विरासत की प्रतीक है। यह एक ऐसा रत्न है, जिसने राजा-महाराजाओं, नवाबों, औपनिवेशिक ताकतों और आधुनिक राष्ट्रों की बदलती तकदीरों को देखा है। यदि यह वाकई 117 साल बाद दुनिया के सामने आता है, तो यह न केवल इतिहास के झरोखे से झांकने का मौका देगा, बल्कि बांग्लादेश की पहचान और प्रतिष्ठा को भी नया आयाम देगा।