नशे में शादी का दावा पड़ा भारी, दिल्ली HC ने तलाक याचिका की खारिज

Report By: Kiran Prakash Singh

दिल्ली हाईकोर्ट ने शादी के समय नशीली दवा के असर का दावा करने वाले पति की तलाक याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा, खुद की गलती का लाभ नहीं मिलेगा।

आज की तारीख: 20 अगस्त 2026
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शादी की वैधता पर सवाल और तलाक की मांग, दिल्ली HC ने पति को नहीं दी राहत

दिल्ली हाईकोर्ट ने शादी को अवैध बताते हुए तलाक की मांग करने वाले एक पति की अपील खारिज कर दी। पति का दावा था कि 20 फरवरी 2008 को आर्य समाज मंदिर में हुई शादी के दौरान वह नशीली या बेहोशी की दवा के असर में था और उसकी वास्तविक सहमति से विवाह नहीं हुआ था। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में शादी स्वतः शून्य नहीं हो जाती।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि पति का दावा सही भी मान लिया जाए, तो यह अधिकतम ऐसी परिस्थिति हो सकती थी जिसमें कानून के तहत विवाह को रद्द कराने की मांग की जा सकती थी। इसके लिए निर्धारित समयसीमा में कानूनी कदम उठाना जरूरी था।

पत्नी ने साथ रहने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया

शादी के कुछ समय बाद ही पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया था। जून 2008 में पत्नी ने पति के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत पति के साथ दोबारा रहने के अधिकार की मांग करते हुए अदालत का रुख किया।

सितंबर 2013 में पत्नी की याचिका पर अदालत ने उसके पक्ष में वैवाहिक अधिकार बहाली का आदेश जारी किया। इसका मतलब था कि दोनों को दोबारा साथ रहने का अवसर दिया गया था। हालांकि आदेश के बावजूद पति-पत्नी साथ नहीं रह सके।

इसके बाद वर्ष 2016 में पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की।

पति ने कहा- पत्नी साथ नहीं रह रही थी

पति ने अपनी तलाक याचिका में दलील दी कि अदालत के आदेश के बावजूद पत्नी उसके साथ नहीं रह रही थी। इसी आधार पर उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A) के तहत तलाक का अधिकार होने का दावा किया।

लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट के रिकॉर्ड से पता चलता है कि पति ने पत्नी को वापस लाने या वैवाहिक संबंध सुधारने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए।

कोर्ट ने यह भी पाया कि पत्नी उसके साथ रहने के लिए तैयार थी और यहां तक कि दोनों के बीच चल रहे मुकदमों को वापस लेने की इच्छा भी जाहिर कर चुकी थी।

कोर्ट ने कहा- अपने गलत आचरण का फायदा नहीं उठा सकते

हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी ने अदालत के आदेश को लागू कराने की कोशिश की थी, लेकिन पति के साथ रहने से इनकार के कारण प्रयास सफल नहीं हो सका। अदालत ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि पति ने खुद स्वीकार किया था कि उसने पत्नी को वापस लाने की कोई कोशिश नहीं की।

अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति अपने ही गलत आचरण का फायदा उठाकर तलाक की मांग नहीं कर सकता।

कोर्ट ने पति के रुख को विरोधाभासी भी बताया। एक तरफ वह शादी के अस्तित्व और वैधता से ही इनकार कर रहा था, जबकि दूसरी तरफ उसी शादी को खत्म करने के लिए तलाक मांग रहा था।

नशीली दवा और गुजारा भत्ता की दलील भी नहीं आई काम

पति ने शादी के समय नशीली दवा के असर में होने और सहमति सही तरीके से नहीं दिए जाने का दावा किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में कानून के तहत विवाह रद्द कराने का विकल्प हो सकता है, लेकिन इसके लिए कानूनी समयसीमा का पालन करना जरूरी है।

पति ने अदालत में यह भी बताया कि वह पत्नी को हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता दे रहा है। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी को गुजारा भत्ता देना अपने आप में तलाक का आधार नहीं बनता।

अदालत ने कहा कि भरण-पोषण देना कानून के तहत जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन इससे तलाक का अधिकार स्वतः पैदा नहीं होता।

अंत में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी या मनमानी गलती नहीं पाई। अदालत ने माना कि पति ने खुद पत्नी के साथ रहने का प्रयास नहीं किया और फिर उसी स्थिति को तलाक का आधार बनाया। इन्हीं कारणों से पति की अपील खारिज कर दी गई।

डिजिटल लाइव न्यूज | 20 अगस्त 2026
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