
Report By: Kiran Prakash Singh
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई के छात्र आंदोलन से जुड़ी FIR पर बड़ा फैसला सुनाया। अनुच्छेद 142 के तहत FIR रद्द कर आगे की कार्रवाई पर रोक लगाई गई।
तारीख: 1 सितंबर 2026 | digitallivenews.com
जंतर-मंतर प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, FIR पर रोक
जुलाई में हुए छात्र आंदोलन से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दिल्ली समेत देश के अलग-अलग राज्यों में प्रदर्शन के दौरान दर्ज की गईं एफआईआर पर आगे की कार्रवाई रोकने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए दिल्ली में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने का आदेश दिया।
इस मामले में दिल्ली पुलिस के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और महाराष्ट्र पुलिस की ओर से भी अपने-अपने राज्यों में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का अनुरोध किया गया था। कोर्ट ने इन अनुरोधों को स्वीकार करते हुए संबंधित मामलों में आगे कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया।
दिल्ली में 13 FIR हुई थीं दर्ज
जुलाई में छात्र आंदोलन के दौरान दिल्ली में 20 से 25 जुलाई के बीच पुलिस ने कुल 13 एफआईआर दर्ज की थीं। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के सामने इन सभी एफआईआर को खत्म करने का अनुरोध किया।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने एक नई एफआईआर दर्ज करने की अनुमति मांगी थी। यह एफआईआर भीड़ में शामिल ऐसे 2,873 लोगों के खिलाफ दर्ज करने की बात कही गई, जिनका गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड होने का दावा किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को इस संबंध में नई एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दे दी।
इससे आंदोलन से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को राहत मिलने का रास्ता साफ हुआ है।
अनुच्छेद 142 के तहत मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए संबंधित एफआईआर को निरस्त करने का आदेश दिया। अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश देने की शक्ति प्रदान करता है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल मेहता ने भी छात्रों से किए गए सरकारी वादों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों से किए गए आश्वासनों को पूरा करना चाहती है।
उन्होंने मुकदमे वापस लेने और भविष्य में इन मामलों को लेकर एफआईआर दर्ज नहीं करने सहित कई मुद्दों का उल्लेख किया।
छात्रों से किए वादे पूरे करने की बात
सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने छात्रों से कुछ वादे किए थे। इनमें मुकदमों को वापस लेना, भविष्य में संबंधित मामलों में एफआईआर नहीं करना और मृत छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना शामिल बताया गया।
सरकार की ओर से कोर्ट से इन वादों को पूरा करने के लिए समय देने का अनुरोध किया गया। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है और मुआवजे को लेकर एक फॉर्मूला तैयार किया जा रहा है।
कोर्ट ने सरकार की ओर से रखी गई बातों को रिकॉर्ड पर लिया और इसके लिए तीन महीने का समय देने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
मृत छात्रों के परिवारों को मुआवजे की तैयारी
सुनवाई के दौरान छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने का मुद्दा भी सामने आया। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि नीट परीक्षा के चलते जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को जल्द मुआवजा देने की दिशा में काम किया जा रहा है।
उन्होंने कोर्ट से फिलहाल मुआवजे को लेकर कोई विस्तृत आदेश जारी नहीं करने का अनुरोध किया। उनका तर्क था कि इस मामले में कोर्ट का आदेश भविष्य में होने वाली सभी तरह की परीक्षाओं के लिए उदाहरण बन सकता है।
सरकार ने कोर्ट से अपने वादों को पूरा करने के लिए तीन महीने का समय मांगा, जिसे जजों ने स्वीकार कर लिया।
5 सितंबर का प्रस्तावित मार्च वापस
सुनवाई के दौरान CJP के सह-संयोजक सौरभ दास भी कोर्ट में मौजूद थे। उन्होंने हाथ जोड़कर जजों का धन्यवाद किया और कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताया।
उन्होंने यह भी घोषणा की कि 5 सितंबर को प्रस्तावित मार्च वापस लिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस बयान को रिकॉर्ड पर लेने का आदेश दिया।
इस फैसले के बाद जुलाई के छात्र आंदोलन से जुड़े मामलों में बड़ी राहत मिली है। दिल्ली के अलावा कई राज्यों की पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर में भी आगे कार्रवाई नहीं होगी। हालांकि, दिल्ली पुलिस को गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले बताए गए 2,873 लोगों को लेकर नई एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी गई है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने छात्र आंदोलन से जुड़े कानूनी मामलों को लेकर एक महत्वपूर्ण दिशा तय की है। अब सरकार द्वारा छात्रों से किए गए अन्य वादों, खासकर मुआवजे और मुकदमों से जुड़े मामलों, पर अगले तीन महीनों में होने वाली कार्रवाई पर नजर रहेगी।
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