
Report By: Kiran Prakash Singh
हालिया सर्वे में नए ग्रेजुएट्स की वर्कप्लेस स्किल्स पर सवाल उठे हैं। कंपनियों ने कम्युनिकेशन, प्रोफेशनल व्यवहार और AI के सही इस्तेमाल की कमी बताई।
2 सितंबर 2026 | digitallivenews.com
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क्या Gen-Z वर्कप्लेस के लिए तैयार नहीं? सर्वे में सामने आई बड़ी तस्वीर
नई पीढ़ी यानी Gen-Z के वर्कप्लेस स्किल्स को लेकर बहस तेज हो गई है। नेशनल एसोसिएशन ऑफ कॉलेजेज एंड एम्प्लॉयर्स (NACE) और अन्य HR सर्वेक्षणों के आंकड़ों में नए ग्रेजुएट्स की नौकरी के लिए तैयारी को लेकर कंपनियों की चिंताएं सामने आई हैं। हालांकि, इन आंकड़ों को पूरी Gen-Z के बारे में निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा, लेकिन ये कम्युनिकेशन, प्रोफेशनल व्यवहार और व्यावहारिक कौशल के बीच अंतर की ओर इशारा करते हैं।
कंपनियों ने नए ग्रेजुएट्स की तैयारी पर उठाए सवाल
NACE के सर्वे के मुताबिक, 71.2% कंपनियों ने नए ग्रेजुएट्स को नौकरी के लिए केवल “कुछ हद तक तैयार” माना। वहीं 21.6% कंपनियों ने उन्हें “बहुत अच्छी तरह तैयार” बताया, जबकि 7.2% एम्प्लॉयर्स का कहना था कि वे बिल्कुल तैयार नहीं हैं।
एक अन्य आंकड़े में करीब 75% कंपनियों ने नए ग्रेजुएट्स के ऑन-जॉब प्रदर्शन को लेकर असंतोष जताया। इससे यह सवाल उठ रहा है कि कॉलेज से निकलने के बाद युवाओं को नौकरी के वास्तविक माहौल के लिए कितनी तैयारी मिल रही है।
ईमेल से मीटिंग तक, किन स्किल्स की कमी?
वर्कप्लेस में नई पीढ़ी के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां बताई जा रही हैं। इनमें ईमेल प्रोटोकॉल, CC और BCC का सही इस्तेमाल, मीटिंग में असहमति को पेशेवर तरीके से रखना और मैनेजर से सही तरीके से संवाद करना शामिल है।
इसके अलावा एक अहम चुनौती AI टूल्स के इस्तेमाल से जुड़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि AI से मिलने वाली जानकारी को बिना जांचे स्वीकार करने के बजाय कर्मचारियों को तथ्यों की पुष्टि करना और गलत जानकारी पहचानना आना चाहिए।
AI और रोबोट को लेकर सामने आया चौंकाने वाला आंकड़ा
800 से अधिक HR अधिकारियों के एक अन्य सर्वे में 37% अधिकारियों ने कहा कि वे किसी नए ग्रेजुएट को नौकरी देने के बजाय रोबोट या AI तकनीक को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे।
वहीं करीब 30% एम्प्लॉयर्स ने कहा कि वे कम प्रोफेशनल स्किल्स वाले उम्मीदवार को नियुक्त करने के बजाय पद को खाली रखना बेहतर समझते हैं। ये आंकड़े एंट्री-लेवल नौकरियों में कंपनियों की बढ़ती अपेक्षाओं और युवाओं की तैयारी के बीच अंतर को दिखाते हैं।
कोविड और स्क्रीन टाइम को भी माना जा रहा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, कोविड-19 महामारी के दौरान लंबे समय तक ऑनलाइन पढ़ाई, स्क्रीन टाइम और आमने-सामने बातचीत के सीमित अवसरों ने युवाओं के सामाजिक और संवाद कौशल को प्रभावित किया हो सकता है।
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजी प्रोफेसर टेसा वेस्ट के मुताबिक, नए छात्रों को कम्युनिकेशन और वास्तविक जीवन की समस्याओं से निपटने में चुनौतियां हो सकती हैं। हालांकि, इसे केवल Gen-Z की समस्या मानने के बजाय महामारी के व्यापक प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है।
समाधान के लिए कॉलेज और कंपनियां दोनों जिम्मेदार
विशेषज्ञों का मानना है कि टेक्निकल स्किल्स के साथ सॉफ्ट स्किल्स पर भी ध्यान देना जरूरी है। बातचीत, टीमवर्क, मतभेदों को संभालना और प्रोफेशनल व्यवहार जैसी क्षमताएं विकसित करने में समय लगता है।
तोशिबा के चीफ HR ऑफिसर जेसन डेसेंट्ज़ ने कॉलेजों और कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई है। वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के प्रोफेसर पीटर कैपेली का तर्क है कि इसके लिए केवल कॉलेजों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कंपनियों को भी एंट्री-लेवल कर्मचारियों की ट्रेनिंग और मेंटरशिप बढ़ानी होगी।
इस तरह Gen-Z को लेकर सामने आए आंकड़े युवाओं की क्षमता पर अंतिम फैसला नहीं हैं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद स्किल गैप पर चर्चा का आधार हैं। कॉलेजों में व्यावहारिक प्रशिक्षण और कंपनियों में बेहतर शुरुआती ट्रेनिंग से इस अंतर को कम किया जा सकता है।
दिनांक: 2 सितंबर 2026
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