PM मोदी-शी जिनपिंग की तियानजिन में अहम बैठक

Report By: Kiran Prakash Singh

नई दिल्ली/बीजिंग (digitallivenews)।

भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों में एक नया मोड़ आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय बैठक हुई, जो गलवान संघर्ष (2020) के बाद पीएम मोदी की पहली चीन यात्रा रही।

इस मुलाकात से पहले दोनों नेता पिछले साल 2024 में रूस के कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मिले थे। तब से लेकर अब तक एलएसी (LAC) पर गश्त को लेकर हुए समझौते और सीमा विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के प्रयासों के चलते दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक प्रगति देखने को मिली है।

बैठक के प्रमुख बिंदु:

  • पीएम मोदी ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने की महत्ता पर बल दिया।

  • उन्होंने निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।

  • कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली जैसे सकारात्मक कदमों का स्वागत किया गया।

  • पीएम मोदी ने शी जिनपिंग को एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए आभार प्रकट किया और इसे स्वीकार करने की बात कही।

राजनयिक प्रयास और तैयारी

बैठक से पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने 19 अगस्त को नई दिल्ली में पीएम मोदी से मुलाकात की थी और शी जिनपिंग का विशेष संदेश सौंपा था। इसके बाद भारत में चीन के राजदूत ने भी 21 अगस्त को बयान दिया कि यह यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में नई ऊर्जा लाएगी।

पीएम मोदी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा:

“विदेश मंत्री वांग यी से मिलकर खुशी हुई। कजान में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई पिछली मुलाकात के बाद से हमारे संबंधों में स्थिर प्रगति हुई है। तियानजिन में अगली मुलाकात का इंतजार है।”

एससीओ की भूमिका

एससीओ (शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन) एक स्थायी अंतर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 15 जून 2001 को शंघाई में हुई थी। वर्तमान में इसके सदस्य देश हैं:
भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और बेलारूस।

इस मंच पर भारत और चीन की द्विपक्षीय बैठक क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।


निष्कर्ष:

तियानजिन में हुई यह ऐतिहासिक बैठक भारत-चीन संबंधों को नई दिशा देने की ओर एक अहम कदम है। जहां दोनों देशों ने आपसी संवेदनाओं और हितों का सम्मान करते हुए सीमा विवाद के समाधान और सहयोग के रास्ते को प्राथमिकता देने का संकेत दिया है, वहीं यह संकेत भी दिया कि आर्थिक और कूटनीतिक स्थिरता के लिए संवाद ही आगे का रास्ता है।

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