ब्रोंको टेस्ट पर डिविलियर्स की तीखी टिप्पणी

Report By: Kiran Prakash Singh

मुंबई (digitallivenews)।

भारतीय क्रिकेट टीम के नए स्ट्रेंथ और कंडीशनिंग कोच एड्रियन ले रॉक्स द्वारा लागू किए गए ब्रोंको टेस्ट को लेकर खिलाड़ियों और विशेषज्ञों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। इस बार दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान और दिग्गज बल्लेबाज एबी डिविलियर्स ने इस फिटनेस टेस्ट को कड़ी आलोचना का निशाना बनाया है।

डिविलियर्स, जिन्हें उनकी बेहतर फिटनेस और आक्रामक खेल शैली के लिए जाना जाता है, ने ब्रोंको टेस्ट को “सबसे बेकार कामों में से एक” बताया। उन्होंने साझा किया कि उन्होंने 16 साल की उम्र से ही इस टेस्ट का अनुभव किया है और स्प्रिंट रिपीट एबिलिटी टेस्ट के नाम से यह दक्षिण अफ्रीका में काफी समय से प्रचलित है।

डिविलियर्स का अनुभव: सांसें फूल जाएंगी

डिविलियर्स ने कहा,

“मुझे याद है कि प्रिटोरिया यूनिवर्सिटी और सुपरस्पोर्ट पार्क में इस टेस्ट को करते समय कितनी तकलीफ होती थी। वहां की ऊंचाई समुद्र तल से करीब 1,500 मीटर है, और ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो जाती थी। फेफड़ों में जलन होती थी और ऐसा लगता था कि सांस ही नहीं आ रही।”

उनका ये बयान ऐसे समय आया है जब भारतीय टीम में ब्रोंको टेस्ट को लेकर बहस तेज हो चुकी है। इससे पहले भारतीय स्पिनर आर अश्विन ने भी इस टेस्ट को लेकर चोटिल होने का खतरा जताया था और इसके लागू होने पर सवाल उठाए थे।

यो-यो टेस्ट के रहते ब्रोंको की क्या जरूरत?

भारतीय क्रिकेट टीम में पहले से ही यो-यो टेस्ट फिटनेस का पैमाना माना जाता रहा है। कई खिलाड़ियों और पूर्व क्रिकेटरों का कहना है कि जब यो-यो टेस्ट पहले से मौजूद है और फिटनेस को मापने में कारगर है, तो ब्रोंको टेस्ट को लाने का क्या औचित्य है?

क्या है ब्रोंको टेस्ट?

ब्रोंको टेस्ट में खिलाड़ी को 20 मीटर, 40 मीटर और 60 मीटर की दूरी पर दौड़ लगानी होती है और इसे कुछ सेकेंड के भीतर कई बार दोहराना होता है। यह एक उच्च तीव्रता वाला कार्डियो टेस्ट है, जो लंग्स, हार्ट और मसल स्टैमिना की परीक्षा लेता है।

लेकिन कई खिलाड़ियों के मुताबिक, यह टेस्ट उनके शरीर पर अनावश्यक दबाव डालता है और खासकर लंबे टूर्नामेंट्स या अंतरराष्ट्रीय मैचों से पहले इसे करना चोटों का खतरा बढ़ा सकता है।


निष्कर्ष:

एबी डिविलियर्स जैसे अनुभवी और फिटनेस में निपुण खिलाड़ी की आलोचना से ब्रोंको टेस्ट की उपयोगिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। क्या भारतीय टीम के लिए यह नया फिटनेस मापदंड सही दिशा है या फिर फिटनेस के नाम पर खिलाड़ियों की सीमाओं की अनदेखी हो रही है—यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है।

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