
Report By: Kiran Prakash Singh
विपक्ष ने US की रूस से तेल खरीद की मंजूरी के बाद केंद्र सरकार पर हमला बोला। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल ने कहा—भारत को अमेरिका की अनुमति क्यों चाहिए?
digitallivnews:-विपक्ष ने India सरकार पर जमकर हमला बोला है, जब अमेरिका ने भारत को रूस से तेल खरीदने की 30-दिन की वैवर (छूट) दी। इस फैसले के बाद कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश की विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा से समझौता कर रही है और अमेरिकी दबाव में भारत के निर्णयों को सीमित कर रही है।
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने 11 फरवरी को संसद में दिए गए अपने भाषण का वीडियो साझा करते हुए चेतावनी दी कि देश की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है। उन्होंने कहा, “अमेरिका तय करेगा कि हम किस देश से तेल खरीद सकते हैं—रूस या ईरान। लेकिन प्रधानमंत्री हमारी बजाय अमेरिका की बात मानेंगे।”
राहुल गांधी ने ट्वीट में यह भी लिखा कि भारत की विदेश नीति इतिहास, भूगोल और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi को निशाना बनाते हुए कहा कि जो हालात देख रहे हैं, वह नीति नहीं, बल्कि किसी समझौते के परिणामस्वरूप उत्पन्न अस्थिर स्थिति है।

कांग्रेस के महासचिव Jairam Ramesh ने ट्विटर पर सवाल किया, “कब तक चलेगा अमेरिकी ब्लैकमेल? ट्रंप की नई योजना—दिल्ली के दोस्त को बताया कि रूस से तेल ले सकते हैं। कब तक चलेगा यह दबाव?”
कांग्रेस नेता Supriya Shrinate ने भी राहुल गांधी का वीडियो साझा किया और कहा कि पार्टी फिर से सही साबित हुई है। उन्होंने पीएम मोदी की मौन नीति पर भी सवाल उठाया और इसे “शर्मनाक” बताया।
वहीं, आम आदमी पार्टी के नेता Arvind Kejriwal ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारत को अमेरिका से यह अनुमति क्यों चाहिए कि वह रूस से तेल खरीद सके। उन्होंने पीएम मोदी पर आरोप लगाया कि वह ट्रम्प के सामने झुक रहे हैं और देश के हित के खिलाफ मौन साधे हुए हैं। केजरीवाल ने पीएम मोदी से इस्तीफे की मांग करते हुए कहा, “देश के लिए सिर झुकाने के बजाय उन्हें तुरंत पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।”
इस विवाद के बीच, अमेरिका के वित्त सचिव Scott Bessent ने घोषणा की कि अमेरिका 30 दिनों की वैवर जारी कर रहा है, ताकि भारतीय रिफाइनर रूस से तेल खरीद सकें और वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति बनी रहे। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप की ऊर्जा नीति के कारण अमेरिका में तेल और गैस उत्पादन अब तक के सबसे उच्च स्तर पर पहुँच गया है।
विश्लेषकों का कहना है कि इस मामले ने भारत की विदेश नीति और ऊर्जा स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष का तर्क है कि भारत को किसी और देश की अनुमति के बिना अपने आर्थिक और ऊर्जा हितों के फैसले लेने चाहिए।
इस पूरी घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि आगामी महीनों में भारत में राजनीतिक बहस और तेज होगी, खासकर अमेरिका-रूस-भारत संबंधों और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर। विपक्ष का कहना है कि अगर देश की रणनीति विदेश दबाव पर आधारित रही तो इसका प्रभाव आम नागरिकों और उद्योग दोनों पर पड़ेगा।
देश की राजनीतिक हलचल के बीच यह सवाल हर जगह उठ रहा है—क्या भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के फैसले अमेरिका की मंजूरी पर निर्भर करने चाहिए, या अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर ध्यान देना चाहिए।