
Report By: Kiran Prakash Singh
🎙️ जावेद अख्तर का फूटा गुस्सा: भारत में तालिबानी मंत्री के स्वागत पर जताई तीखी नाराज़गी
✍️ एक्स पर खुलकर बोले मशहूर गीतकार: “मुझे शर्म आती है… ये हमें क्या हो गया है?”
नई दिल्ली (Digitalive News) — प्रख्यात गीतकार, लेखक और सामाजिक चिंतक जावेद अख्तर ने तालिबानी विदेश मंत्री के भारत आगमन पर भव्य स्वागत को लेकर गहरा आक्रोश जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक भावनात्मक और तीखा पोस्ट साझा करते हुए भारत में कट्टरपंथी संगठन के प्रतिनिधि को सम्मान देने पर सवाल खड़े किए हैं।
यह पहली बार नहीं है जब जावेद अख्तर ने सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर खुलकर आवाज उठाई हो। वह लगातार समानता, महिला अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर मुखर रहते हैं।
🚨 तालिबान को बताया महिलाओं का शोषक, देवबंद को भी फटकार
जावेद अख्तर ने अपने पोस्ट में लिखा:
“मुझे शर्म आती है। मेरा सिर शर्म से झुक जाता है जब मैं देखता हूं कि दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी समूह तालिबान के प्रतिनिधि का भारत में भव्य स्वागत होता है। देवबंद को भी शर्म आनी चाहिए कि उन्होंने अपने ‘इस्लामिक हीरो’ का इतना आदरपूर्ण स्वागत किया।”
उन्होंने यह भी लिखा कि यह वही तालिबानी मंत्री हैं जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और जो लड़कियों के अधिकारों और स्वतंत्रता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
🔥 “ये हमें क्या हो गया है?” — अख्तर का सवाल
अख्तर ने अपने पोस्ट में भारतीय समाज से एक गहन सवाल पूछा:
“मेरे भारतीय भाइयों और बहनों… ये हमें क्या हो गया है?”
इस कथन से उनकी चिंता सिर्फ राजनीतिक निर्णयों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक चेतना और नैतिक दृष्टिकोण पर भी सवाल है। उन्होंने उन लोगों की भी आलोचना की जो आम तौर पर आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाते हैं, लेकिन तालिबान के मामले में चुप्पी साधे बैठे हैं या फिर सम्मान में भागीदार बने हैं।
🕌 दारुल उलूम देवबंद को भी घेरा
जावेद अख्तर ने सीधे तौर पर सहारनपुर स्थित दारुल उलूम देवबंद की भी आलोचना की, जिसने तालिबानी मंत्री के स्वागत में सम्मान समारोह आयोजित किया। उन्होंने इसे “आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई” के खिलाफ बताया।
“देवबंद जैसे संस्थानों को आत्ममंथन करना चाहिए कि वे किस प्रकार के व्यक्तित्व को ‘इस्लामिक हीरो’ मानते हैं।”
🎥 फिल्म इंडस्ट्री और पुरुष मानसिकता पर भी उठाए सवाल
जावेद अख्तर ने हाल ही में एक बयान में फिल्म इंडस्ट्री में पुरुष-प्रधान सोच और अश्लील फिल्मों की लोकप्रियता को लेकर भी चिंता जताई थी। उन्होंने कहा:
“आज भी ज्यादातर फिल्में मर्दों के लिए बनती हैं। ये समाज की उस मानसिकता का नतीजा है, जो महिलाओं को उपभोग की वस्तु मानती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि यदि समाज में पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो, तो ऐसी फिल्मों का निर्माण और समर्थन दोनों कम हो जाएंगे।
📢 साहित्यकार से सामाजिक प्रहरी तक
जावेद अख्तर अपने गीतों और शायरी में संवेदनशीलता और सामाजिक बदलाव की बात करते आए हैं। अब वे एक साहित्यकार से आगे बढ़कर सामाजिक प्रहरी की भूमिका निभा रहे हैं। उनकी यह पोस्ट केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली बात है।
🔚 निष्कर्ष: क्या भारत अपनी नैतिक दिशा खो रहा है?
जावेद अख्तर के बयान ने एक बार फिर से यह बहस छेड़ दी है कि भारत की विदेश नीति, आतंरिक सामाजिक मूल्यों और धार्मिक संस्थानों के रुख में कितना तालमेल है। क्या किसी ऐसे संगठन को सम्मान देना, जो महिलाओं की आज़ादी और शिक्षा का विरोधी है, एक लोकतांत्रिक और समावेशी देश के मूल्यों के साथ मेल खाता है?
यह केवल एक विरोध नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और विवेक को जगाने की पुकार है — जो सवाल करता है:
“क्या हम वो देश हैं, जो कभी महिलाओं के सम्मान और समानता के लिए लड़ता था?”
🖊️ रिपोर्ट: Digitalive News | संपादन: न्यूज़ डेस्क