किन्नरों की ‘नेग वसूली’ पर हाईकोर्ट सख्त, परंपरा को नहीं मिला कानूनी अधिकार

Report By: Kiran Prakash Singh

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘नेग वसूली’ पर बड़ा फैसला देते हुए कहा कि परंपरा के नाम पर जबरन पैसे लेना गैरकानूनी है और इसे अधिकार नहीं माना जा सकता।

किन्नरों की ‘नेग वसूली’ पर हाईकोर्ट की सख्ती: परंपरा नहीं, कानून सर्वोपरि

1. अदालत का स्पष्ट संदेश: परंपरा से ऊपर कानून नहीं

प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हालिया फैसले में साफ कर दिया कि किसी भी परंपरा को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि किन्नर समुदाय द्वारा ‘बधाई’ या ‘नेग’ के नाम पर की जाने वाली वसूली का कोई स्वतःसिद्ध कानूनी अधिकार नहीं है।
यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को यह संदेश देती है कि कानूनी मान्यता के बिना कोई भी प्रथा वैध नहीं मानी जा सकती।

2. ‘रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामला क्या था

यह फैसला ‘रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ केस में आया, जिसमें याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि एक विशेष क्षेत्र को ‘नेग वसूली’ के लिए उसका अधिकार क्षेत्र घोषित किया जाए।
याचिका में यह भी कहा गया था कि अन्य किन्नरों को उस क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से रोका जाए। लेकिन अदालत ने इस मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि ऐसा कोई अधिकार कानून में मौजूद नहीं है।

3. ‘नेग’ या ‘बधाई’ वसूली पर कानूनी स्थिति

अदालत ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि कर, शुल्क या किसी भी प्रकार की वसूली केवल कानून के तहत ही संभव है।
यदि कोई व्यक्ति या समूह दबाव, डर या परंपरा का हवाला देकर पैसे लेता है, तो यह अवैध वसूली या उगाही की श्रेणी में आ सकता है।
यानी, “बधाई” जैसी प्रथाएं सांस्कृतिक हो सकती हैं, लेकिन उन्हें कानूनी अधिकार का रूप नहीं दिया जा सकता।

4. ट्रांसजेंडर कानून में नहीं है ऐसा कोई प्रावधान

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 में कहीं भी ‘नेग’ या ‘बधाई’ वसूलने का कोई विशेष अधिकार नहीं दिया गया है।
इसका मतलब यह है कि ट्रांसजेंडर समुदाय को दिए गए अधिकार सम्मान, समानता और सुरक्षा से जुड़े हैं, न कि किसी तरह की आर्थिक वसूली से।

5. समाज और व्यवस्था के लिए बड़ा संकेत

अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की मांगों को मान लिया जाए, तो यह अन्य लोगों या समूहों द्वारा भी अवैध वसूली को बढ़ावा दे सकता है।
यह फैसला उन विवादों पर भी रोक लगाने वाला है, जिनमें अक्सर किन्नर समुदाय के भीतर क्षेत्राधिकार को लेकर टकराव और हिंसा की घटनाएं सामने आती रही हैं।


निष्कर्ष: कानून की सीमा में ही परंपराओं का सम्मान

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि परंपराएं तभी तक स्वीकार्य हैं, जब तक वे कानून और नागरिक अधिकारों के दायरे में हों।
हर नागरिक की तरह किन्नर समुदाय भी समान अधिकार रखता है, लेकिन किसी भी प्रकार का विशेष आर्थिक अधिकार बिना कानूनी आधार के मान्य नहीं हो सकता।

यह निर्णय न सिर्फ कानूनी स्पष्टता लाता है, बल्कि समाज को यह भी समझाता है कि सम्मान और परंपरा का संतुलन कानून के भीतर रहकर ही संभव है।

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