तेज रफ्तार अपराध नहीं, लापरवाही साबित करना जरूरी: हाईकोर्ट

Report By: Kiran Prakash Singh

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि केवल तेज रफ्तार के आधार पर चालक को लापरवाह नहीं माना जा सकता। अभियोजन को खतरनाक ड्राइविंग के ठोस सबूत देने होंगे।

नई दिल्ली, 3 सितंबर 2026 | digitallivenews.com


तेज रफ्तार पर दिल्ली हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, चालक को मिली राहत

दिल्ली हाईकोर्ट ने सड़क हादसे से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए तेज रफ्तार और लापरवाह ड्राइविंग को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई वाहन तेज गति से चल रहा था, चालक को अपने आप रैश या लापरवाह नहीं माना जा सकता। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि चालक ने परिस्थितियों के अनुरूप वास्तव में खतरनाक या लापरवाहीपूर्ण तरीके से वाहन चलाया था।

यह मामला वर्ष 2009 के एक सड़क हादसे से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी। इस मामले में दिल्ली सरकार ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें टेंपो चालक को आरोपों से बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और सरकार की अपील खारिज कर दी।

सिर्फ तेज गति से वाहन चलाना अपराध नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि तेज रफ्तार और ओवरस्पीड सापेक्ष शब्द हैं। किसी सड़क पर जिस गति को सामान्य माना जा सकता है, वहीं दूसरी परिस्थिति में वही गति जोखिम भरी हो सकती है।

कोर्ट के अनुसार, वाहन तेज गति से चलने के लिए ही बनाए जाते हैं। इसलिए महज यह तथ्य कि दुर्घटना के समय वाहन तेज गति में था, चालक की लापरवाही साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

चालक को दोषी ठहराने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि उसकी ड्राइविंग परिस्थितियों के अनुसार ऐसी थी, जिसे लापरवाह या खतरनाक कहा जा सके।

गवाह के बयान पर भी कोर्ट ने गौर किया

मामले में एक गवाह ने दावा किया था कि वह सड़क के बाईं ओर साइकिल चला रहा था और सामने से आ रहे टेंपो ने उसकी साइकिल को टक्कर मार दी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने गवाह के बयान की तुलना मामले में मौजूद अन्य साक्ष्यों से की। कोर्ट को गवाह के बयान और मेडिकल तथा मैकेनिकल साक्ष्यों के बीच कुछ विरोधाभास नजर आए।

अदालत ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में केवल एक बयान के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उपलब्ध अन्य साक्ष्य उस बयान की पुष्टि नहीं करते हों।

गवाह को चोट लगने का प्रमाण नहीं मिला

हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि जिस गवाह ने हादसे का विवरण दिया था, उसके शरीर पर किसी तरह की चोट या खरोंच के प्रमाण सामने नहीं आए थे।

अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि हादसे के बाद गवाह का मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया था। इस वजह से अभियोजन की ओर से पेश की गई घटना की कहानी को लेकर अदालत ने अतिरिक्त सावधानी बरती।

कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों को समग्र रूप से देखते हुए माना कि गवाह के बयान को अन्य परिस्थितिजन्य और तकनीकी साक्ष्यों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा था।

टेंपो की मैकेनिकल जांच भी बनी अहम आधार

मामले में टेंपो की मैकेनिकल जांच भी कराई गई थी। जांच में वाहन के बाएं हिस्से के कोने पर मामूली डेंट पाया गया था।

कोर्ट ने इस तथ्य को भी घटना के कथित तरीके के साथ मिलाकर देखा। अदालत के अनुसार, अगर गवाह के बताए तरीके से टेंपो ने सामने से साइकिल को टक्कर मारी होती, तो वाहन के दाहिने हिस्से में अधिक क्षति होने की संभावना पर भी विचार किया जाना चाहिए था।

मैकेनिकल साक्ष्य और गवाह के बयान के बीच यह अंतर अभियोजन की कहानी को मजबूत तरीके से साबित करने में बाधा बना।

अभियोजन लापरवाही साबित नहीं कर सका

मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष चालक की जल्दबाजी या लापरवाही को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ।

कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें टेंपो चालक को बरी किया गया था। इसके साथ ही दिल्ली सरकार की अपील को खारिज कर दिया गया।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सड़क हादसे के मामलों में सिर्फ वाहन की गति को आधार बनाकर चालक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ड्राइविंग का तरीका, सड़क की परिस्थितियां, दुर्घटना का स्वरूप और उपलब्ध साक्ष्य सभी महत्वपूर्ण होते हैं।

यह फैसला सड़क दुर्घटना से जुड़े मामलों में साक्ष्यों की भूमिका को रेखांकित करता है। अदालत ने साफ किया कि किसी चालक की आपराधिक लापरवाही साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय प्रमाण जरूरी हैं।

3 सितंबर 2026 | digitallivenews.com

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