
Report By: Kiran Prakash Singh
इलाहाबाद और बॉम्बे हाईकोर्ट के विवादित फैसलों ने देशभर में बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद न्यायिक संवेदनशीलता पर बड़े सवाल उठे हैं।
🔴 मुख्य शीर्षक: न्याय या व्याख्या? विवादित फैसलों से उठे बड़े सवाल
देश में हाल ही में कुछ न्यायिक फैसलों ने न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। खासतौर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के कुछ निर्णयों ने समाज, कानून विशेषज्ञों और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े संगठनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का विवादित फैसला
मार्च 2025 में जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने एक मामले में कहा कि स्तन पकड़ना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना और खींचकर ले जाना “रेप की कोशिश” नहीं माना जा सकता।
इस फैसले के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। आलोचकों ने कहा कि यह महिलाओं के खिलाफ अपराध को कमतर आंकने जैसा है।
⚡ सुप्रीम कोर्ट की सख्त प्रतिक्रिया
मामला बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को “पूरी तरह असंवेदनशील” बताते हुए रोक लगा दी।
बाद में शीर्ष अदालत ने इस निर्णय को पलट दिया और साफ किया कि ऐसे कृत्य गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं।
यह कदम दिखाता है कि न्याय व्यवस्था के भीतर भी अलग-अलग व्याख्याओं पर टकराव हो सकता है।
⚖️ ‘स्किन-टू-स्किन’ विवाद और बॉम्बे हाईकोर्ट
इससे पहले जस्टिस पुष्पा वीरेंद्र गनेडीवाल का “skin-to-skin contact” वाला फैसला भी विवादों में रहा।
उन्होंने कहा था कि कपड़ों के ऊपर से छूना POCSO के तहत यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता।
इस फैसले की भी देशभर में आलोचना हुई और इसे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के खिलाफ बताया गया।
🔁 सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला
इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि “इरादा (sexual intent)” ज्यादा महत्वपूर्ण है, न कि सिर्फ skin contact।
यानी अगर किसी की नीयत गलत है, तो कपड़ों के ऊपर या बिना सीधे संपर्क के भी अपराध बन सकता है।
📊 कानून बनाम व्याख्या
इन मामलों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—
क्या कानून की तकनीकी व्याख्या कभी-कभी न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर देती है?
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि
- कानून का उद्देश्य पीड़ित को सुरक्षा देना है
- लेकिन शब्दों की संकीर्ण व्याख्या से अपराध की गंभीरता कम हो सकती है
👩⚖️ न्यायिक संवेदनशीलता पर बहस
इन फैसलों के बाद यह बहस तेज हो गई कि क्या न्यायाधीशों को समाज की वास्तविकताओं और पीड़ित के दर्द को ज्यादा महत्व देना चाहिए।
आलोचकों का कहना है कि
“कानून सिर्फ तकनीकी नहीं, मानवीय भी होना चाहिए”
🧠 निष्कर्ष
इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि
- न्यायिक फैसले केवल कानून की भाषा पर नहीं
- बल्कि संवेदनशीलता और सामाजिक समझ पर भी निर्भर करते हैं
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने यह संदेश दिया कि
👉 महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में कोई भी ढिलाई स्वीकार नहीं होगी