
Report By: Kiran Prakash Singh
हरिद्वार में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बाबा रामदेव ने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शब्दों का मूल अर्थ जाति नहीं, बल्कि कर्म से जुड़ा था। उन्होंने सनातन धर्म में भेदभाव की परंपरा को लेकर भी अपनी बात रखी।
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बाबा रामदेव बोले- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातिसूचक शब्द नहीं, सनातन में सब बराबर
Digital Live News | 28 अक्टूबर 2026 | digitallivenews.com
योग गुरु बाबा रामदेव ने सनातन धर्म और जाति व्यवस्था को लेकर बयान दिया है। हरिद्वार में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि सनातन धर्म को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शब्दों को केवल जाति के आधार पर नहीं समझना चाहिए, बल्कि इनके मूल अर्थ को कर्म और सामाजिक जिम्मेदारियों से जोड़कर देखना चाहिए।
रामदेव ने धार्मिक ग्रंथों और वेदों का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन परंपरा में सत्य, न्याय और समानता को महत्व दिया गया है। उन्होंने जाति के आधार पर भेदभाव को सामाजिक विभाजन का कारण बताया। हालांकि, जाति व्यवस्था और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या को लेकर अलग-अलग विद्वानों के विचार रहे हैं।
1. ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शब्दों का अर्थ कर्म से जुड़ा’
बाबा रामदेव ने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शब्दों को केवल जातिसूचक पहचान के रूप में देखना सही नहीं है। उन्होंने इन शब्दों की व्याख्या अलग-अलग सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों के रूप में की।
रामदेव के मुताबिक, जो अज्ञान को दूर करे, वह ब्राह्मण है; जो अन्याय के खिलाफ खड़ा हो, वह क्षत्रिय है; जो अभाव दूर करने का काम करे, वह वैश्य है; और जो समाज में स्वच्छता एवं शुचिता स्थापित करे, वह शूद्र है।
उन्होंने दावा किया कि बाद के समय में इन शब्दों को जाति के आधार पर बांटकर सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा दिया गया।
2. ‘जहां वेद हैं, वहां भेदभाव नहीं हो सकता’
रामदेव ने कहा कि भेदभाव की दीवारें खड़ी करना वेदों और सनातन धर्म की मूल भावना के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि समाज में जाति के नाम पर विभाजन पैदा कर लोगों को एक-दूसरे से दूर किया गया।
उन्होंने भारतीय संविधान में समानता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्य और न्याय को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, सामाजिक एकता और परस्पर सम्मान के बिना समाज मजबूत नहीं बन सकता।
3. मनुस्मृति और धार्मिक ग्रंथों का किया जिक्र
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बाबा रामदेव ने मनुस्मृति और अन्य धार्मिक ग्रंथों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में किसी वर्ग या स्त्री का अपमान करने की शिक्षा नहीं दी गई है।
हालांकि, मनुस्मृति और प्राचीन धार्मिक ग्रंथों की सामाजिक व्याख्या को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। आलोचक कुछ श्लोकों को जाति आधारित पदानुक्रम और महिलाओं की स्थिति से जोड़कर देखते हैं, जबकि अलग-अलग धार्मिक विद्वान इन ग्रंथों की व्याख्या और ऐतिहासिक संदर्भ पर अलग-अलग विचार रखते हैं।
4. विदेशी शासन और राजनीतिक व्यवस्था पर लगाए आरोप
रामदेव ने आरोप लगाया कि विदेशी शासन के दौरान सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिला और जाति के आधार पर भेदभाव की दीवारें मजबूत हुईं। उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था पर भी निशाना साधते हुए कहा कि सामाजिक विभाजन को रोकने के बजाय कई बार उसे संरक्षण दिया गया।
ये आरोप बाबा रामदेव के अपने विचार हैं। जाति व्यवस्था के विकास में धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों की भूमिका को लेकर इतिहासकारों के बीच विभिन्न मत मौजूद हैं।
5. धर्म, समाज और समानता पर रखी अपनी बात
बाबा रामदेव ने अपने बयान में धार्मिक और सामाजिक पहचान के आधार पर लोगों के बीच विभाजन पर आपत्ति जताई। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में आर्थिक स्थिति के आधार पर भगवान और धार्मिक आस्था को लेकर भेदभावपूर्ण टिप्पणियां की जाती हैं।
उन्होंने सनातन धर्म को सत्य, न्याय और समानता से जोड़ते हुए सामाजिक एकता की जरूरत पर जोर दिया। उनके इस बयान के बाद जाति व्यवस्था, धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या और सामाजिक समानता को लेकर बहस फिर चर्चा में आ सकती है।
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