फिलीस्तीन मुद्दे पर सोनिया गांधी ने मोदी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए

Report By: Kiran Prakash Singh

सोनिया गांधी का केंद्र पर हमला: “फिलीस्तीन पर चुप्पी मानवता और नैतिकता का परित्याग”

नई दिल्ली (DigitalLive)। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने फिलीस्तीन-इजराइल संघर्ष पर केंद्र सरकार की नीति और रवैये पर तीखा हमला बोला है। गुरुवार को एक अंग्रेज़ी अख़बार में लिखे लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि इस गंभीर मानवीय संकट पर सरकार की “गहरी चुप्पी” न केवल नैतिकता, बल्कि मानवता का भी परित्याग है।

“मोदी-नेतन्याहू की व्यक्तिगत मित्रता से प्रेरित नीति”

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि भारत की मौजूदा विदेश नीति, खासतौर पर फिलीस्तीन के मुद्दे पर, संवैधानिक मूल्यों या रणनीतिक हितों के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की व्यक्तिगत मित्रता से प्रेरित दिखती है। उन्होंने कहा, “व्यक्तिगत कूटनीति की यह शैली भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शक नहीं हो सकती।”

भारत का ऐतिहासिक रुख रहा फिलीस्तीन के पक्ष में

सोनिया गांधी ने याद दिलाया कि भारत ने 1988 में औपचारिक रूप से फिलीस्तीन को मान्यता दी थी और दशकों तक फिलीस्तीन मुक्ति संगठन का समर्थन करता रहा है। उन्होंने कहा, “भारत ने स्वतंत्रता से पहले दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार जैसे मामलों में भी सैद्धांतिक और साहसी रुख अपनाया था।”

वैश्विक रुझान की ओर इशारा

उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में फ्रांस भी उन देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने फिलीस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी है। ब्रिटेन, कनाडा, पुर्तगाल, ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देश भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। अब तक संयुक्त राष्ट्र के 193 में से 150 से अधिक सदस्य देश फिलीस्तीन को मान्यता दे चुके हैं।

सरकार से नेतृत्व दिखाने की अपील

अपने लेख के अंत में सोनिया गांधी ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक और ऐतिहासिक रूप से सिद्धांतवादी देश को अब नेतृत्व दिखाने की जरूरत है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह शांति, मानवाधिकार और न्याय के मूल्यों पर आधारित अपनी पारंपरिक विदेश नीति पर लौटे।


निष्कर्ष:
सोनिया गांधी का यह लेख न केवल केंद्र सरकार की मौन नीति की आलोचना है, बल्कि भारत की ऐतिहासिक विदेश नीति पर लौटने का आह्वान भी है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि फिलीस्तीन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भारत की भूमिका केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय नेतृत्व की होनी चाहिए।

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