16 साल पुराने हत्याकांड में प्रमोद चौधरी समेत दो को फांसी

Report By: Kiran Prakash Singh

मुजफ्फरनगर के चर्चित किसान राजबीर सिंह हत्याकांड में 16 साल बाद फैसला आया। कोर्ट ने पूर्व प्रधान प्रमोद चौधरी और सहदेव को फांसी की सजा सुनाई।

16 साल बाद आया फैसला, किसान राजबीर सिंह हत्याकांड में दो दोषियों को फांसी

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में वर्ष 2010 में हुए चर्चित किसान राजबीर सिंह हत्याकांड में आखिरकार 16 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने इस मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मानते हुए मुख्य आरोपी पूर्व प्रधान प्रमोद चौधरी और उसके साथी सहदेव उर्फ पप्पू को फांसी की सजा सुनाई। अदालत ने दोनों दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। खास बात यह है कि प्रमोद चौधरी, फिरोजाबाद के एडिशनल एसपी अनुज चौधरी का ममेरा भाई बताया जा रहा है।

पंचायत चुनाव से शुरू हुई खूनी रंजिश

मामले की शुरुआत 2010 के पंचायत चुनाव से हुई थी। मांडी गांव निवासी 60 वर्षीय किसान राजबीर सिंह ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। आरोप है कि तत्कालीन प्रधान प्रमोद चौधरी इससे नाराज था और दोनों के बीच लंबे समय से रंजिश चल रही थी।

खेत जाते समय घेरकर की गई हत्या

24 अगस्त 2010 को राजबीर सिंह अपने खेतों की ओर जा रहे थे। तभी जंगल में पहले से घात लगाए बैठे प्रमोद चौधरी, सहदेव और उनके दो शूटर अमित तथा विपिन शर्मा ने उन्हें घेर लिया। आरोपियों ने पिस्टल से ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने खोली वारदात की क्रूरता

पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर संजय भटनागर के अनुसार राजबीर सिंह के शरीर पर 7 गनशॉट इंजरी मिलीं, जिनमें 5 एंट्री और 2 एग्जिट वुंड शामिल थे। चेहरे, गर्दन और छाती पर बेहद करीब से गोली मारने के निशान पाए गए। अदालत ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही एक-दूसरे की पुष्टि करती हैं।

सबसे अहम सबूत मालखाने से गायब

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि घटनास्थल से बरामद 32 बोर के चार खोखा कारतूस तितावी थाने के मालखाने से रहस्यमय तरीके से गायब हो गए थे। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने पुलिसकर्मियों से मिलीभगत कर ये सबूत गायब करवाए। मामले के विवेचक ने भी अदालत में स्वीकार किया कि कारतूस मालखाने से गायब हैं।

कोर्ट ने पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई के दिए आदेश

अदालत ने इस लापरवाही को बेहद गंभीर मानते हुए मुजफ्फरनगर के एसएसपी को निर्देश दिया कि सबूत गायब होने की जिम्मेदारी तय की जाए। साथ ही जिन पुलिसकर्मियों की भूमिका सामने आए, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाए।

कोर्ट का अंतिम फैसला

अदालत ने माना कि यह हत्या पूर्व नियोजित और बेहद क्रूर तरीके से की गई थी। गवाह संजीव कुमार के सामने प्रमोद चौधरी द्वारा जुर्म कबूल करने की बात भी रिकॉर्ड में शामिल की गई। वहीं, इस हत्याकांड में शामिल दोनों शूटर अमित और विपिन शर्मा को पुलिस ने 17 जनवरी 2011 को एनकाउंटर में मार गिराया था, जिसके बाद उनके खिलाफ सुनवाई समाप्त हो गई।

सभी साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर अदालत ने प्रमोद चौधरी और सहदेव उर्फ पप्पू को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। 16 साल तक चले इस बहुचर्चित मामले में आए फैसले को मुजफ्फरनगर की न्यायिक व्यवस्था का एक बड़ा निर्णय माना जा रहा है।

रिपोर्ट: Digitallivenews.com | 7 जुलाई 2026

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