
Report By: Kiran Prakash Singh
NCERT ने कक्षा 8 की समाज विज्ञान पुस्तक वापस ली। सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति के बाद न्यायपालिका अध्याय संशोधित होगा, 2026–27 में नई किताब।
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शिक्षा जगत में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। National Council of Educational Research and Training (NCERT) ने कक्षा 8 की नई समाज विज्ञान पाठ्यपुस्तक को वापस लेने का फैसला किया है। यह कदम तब उठाया गया जब Supreme Court of India ने न्यायपालिका से जुड़े एक अध्याय पर कड़ी आपत्ति जताई।
विवाद उस अध्याय को लेकर था, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के संदर्भ का उल्लेख किया गया था। शीर्ष अदालत ने इस प्रस्तुति पर गंभीर चिंता व्यक्त की और इसे संस्थान की गरिमा से जुड़ा मुद्दा बताया।
⚖️ अदालत की कड़ी टिप्पणी
मामला तब और गंभीर हो गया जब भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने खुले न्यायालय में सख्त टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी को भी न्यायपालिका की अखंडता पर प्रश्नचिह्न लगाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
उनकी टिप्पणी से यह संकेत मिला कि अदालत इस विषय को केवल एक शैक्षणिक बहस के रूप में नहीं, बल्कि संस्थागत गरिमा से जुड़ा मुद्दा मान रही है।
📘 NCERT का स्पष्टीकरण
NCERT ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि विवादित अंश का समावेश “पूरी तरह अनजाने में” हुआ। परिषद ने दोहराया कि न्यायपालिका देश का एक सम्मानित संवैधानिक स्तंभ है और उसकी प्रतिष्ठा को कम करने का कोई उद्देश्य नहीं था।
परिषद के अनुसार, नई पाठ्यपुस्तकों का मकसद छात्रों में संवैधानिक साक्षरता, लोकतांत्रिक भागीदारी की समझ और संस्थाओं के प्रति सम्मान को मजबूत करना है।
🔄 2026–27 सत्र में आएगा नया संस्करण
NCERT ने घोषणा की है कि संबंधित अध्याय का पूर्ण पुनर्लेखन किया जाएगा। इसके लिए विषय विशेषज्ञों और उपयुक्त प्राधिकरणों से परामर्श लिया जाएगा ताकि सामग्री संतुलित और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हो।
संशोधित पाठ्यपुस्तक 2026–27 शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में छात्रों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।
परिषद ने यह भी कहा कि वह रचनात्मक सुझावों के लिए हमेशा खुली है और निरंतर समीक्षा प्रक्रिया के तहत आवश्यक बदलाव करती रहती है।
🗣️ पाठ्यक्रम में संतुलन पर बहस
इस घटनाक्रम ने पाठ्यक्रम की संतुलित प्रस्तुति पर भी चर्चा छेड़ दी है। वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi ने सवाल उठाया कि यदि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का जिक्र किया गया है, तो राजनीति, नौकरशाही या अन्य सार्वजनिक संस्थानों पर समान दृष्टिकोण क्यों नहीं अपनाया गया।
उनके अनुसार, एकतरफा प्रस्तुति से असंतुलन की छवि बन सकती है।
📚 शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों का संतुलन
यह पूरा प्रकरण शिक्षा सामग्री में संवेदनशील विषयों की प्रस्तुति को लेकर व्यापक बहस का कारण बना है। एक ओर पाठ्यपुस्तकों का उद्देश्य छात्रों को वास्तविकताओं से परिचित कराना है, वहीं दूसरी ओर संस्थाओं की गरिमा और संतुलित दृष्टिकोण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
NCERT का यह कदम दर्शाता है कि शैक्षणिक संस्थान आलोचनाओं और सुझावों के आधार पर सुधार के लिए तैयार हैं। अब सभी की नजरें 2026–27 में आने वाले संशोधित संस्करण पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि संवैधानिक मूल्यों और आलोचनात्मक सोच के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।