वंदे मातरम पर मौलाना साजिद रशीदी का बड़ा बयान, बोले- नहीं गाएंगे

Report By: Kiran Prakash Singh

वंदे मातरम को लेकर मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि यह उनकी धार्मिक आस्था के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि अपील के बावजूद वह इसे नहीं गाएंगे।

नई दिल्ली, 3 सितंबर 2026 | digitallivenews.com


वंदे मातरम पर फिर छिड़ी बहस, मौलाना साजिद रशीदी ने रखी अपनी बात

राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर जारी चर्चा के बीच दिल्ली-ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा है कि वह हिंदुओं की आस्था पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन वंदे मातरम को लेकर उनकी धार्मिक मान्यता अलग है। इसी वजह से वह इस गीत को गाने से सहमत नहीं हैं।

यह बयान पर्यावरणविद और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो की ओर से वंदे मातरम के समर्थन में दिए गए बयान के बाद आया है। गीतांजलि आंग्मो ने कहा था कि भारत को हजारों वर्षों से मां के रूप में देखा जाता रहा है और लोगों को बड़े दिल के साथ इस भावना को अपनाना चाहिए।

मौलाना साजिद रशीदी ने उनके बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए वंदे मातरम और गजल के बीच तुलना को अनुचित बताया और अपनी धार्मिक मान्यताओं को सामने रखा।

गीतांजलि आंग्मो के बयान पर रशीदी की प्रतिक्रिया

गीतांजलि आंग्मो ने वंदे मातरम के मूल भाव को भारत माता को नमन करने की भावना से जोड़ा था। उन्होंने कहा था कि देश को मां के रूप में देखने की परंपरा पुरानी है और इसे छोड़ना उचित नहीं होगा।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए साजिद रशीदी ने कहा कि वंदे मातरम की तुलना गजल के इश्किया अशआर से करना सही नहीं है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि गजल में प्रेम से जुड़े भाव हो सकते हैं, जबकि वंदे मातरम के संदर्भ में वंदना और पूजा का विषय आता है।

रशीदी ने इसे लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की और कहा कि दोनों विषयों को एक समान नहीं माना जा सकता।

बोले- हिंदुओं की आस्था पर सवाल नहीं

मौलाना साजिद रशीदी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि वह हिंदुओं की आस्था पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अलग-अलग धर्मों की अपनी-अपनी मान्यताएं होती हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मुसलमान एक अल्लाह की इबादत करते हैं और उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किसी अन्य रूप में वंदना करना स्वीकार्य नहीं है।

रशीदी के मुताबिक, भारत की मिट्टी, पेड़-पौधों और नदियों को लेकर किसी की धार्मिक या सांस्कृतिक आस्था हो सकती है, लेकिन वह आस्था उनकी धार्मिक मान्यता का हिस्सा नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने वंदे मातरम को लेकर अपनी असहमति जाहिर की।

भारत माता की अवधारणा पर अलग राय

साजिद रशीदी ने अपने बयान में भारत माता की अवधारणा को लेकर भी अपनी बात रखी। उनका कहना है कि भारत को माता के रूप में मानना उनकी धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत के नक्शे के साथ महिला के रूप में बनाई गई तस्वीर और उसके सामने वंदना करने की अवधारणा को वह स्वीकार नहीं करते। रशीदी ने दावा किया कि गीत के लेखक की मंशा भी इसी तरह की थी।

हालांकि, वंदे मातरम के अर्थ और ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर देश में लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं। इसी वजह से समय-समय पर इस गीत को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस भी सामने आती रही है।

राष्ट्रपति की अपील पर भी नहीं बदलेंगे रुख

मौलाना साजिद रशीदी ने अपने बयान में यह भी कहा कि अगर देश की राष्ट्रपति भी मुसलमानों से वंदे मातरम गाने की अपील करें, तब भी वह इसे नहीं गाएंगे।

उन्होंने कहा कि उनकी नजर में यह मामला धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत मान्यता से जुड़ा है। उनका दावा है कि संविधान व्यक्ति को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किसी ऐसी चीज को स्वीकार या अस्वीकार करने की स्वतंत्रता देता है, जिसे वह अपनी आस्था के विपरीत मानता है।

रशीदी के इस बयान के बाद वंदे मातरम को लेकर चल रही चर्चा एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।

बयान के बाद फिर चर्चा में आया वंदे मातरम

वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण गीत रहा है। इसे लेकर देश में सम्मान और भावनाएं जुड़ी हुई हैं। वहीं, इसके कुछ शब्दों और धार्मिक व्याख्या को लेकर अलग-अलग समुदायों और विचारधाराओं के बीच समय-समय पर बहस भी होती रही है।

मौजूदा विवाद में एक तरफ गीतांजलि आंग्मो ने इसे भारत के प्रति सम्मान और मातृभावना से जोड़कर अपनाने की बात कही, वहीं साजिद रशीदी ने इसे अपनी धार्मिक आस्था के अनुरूप न होने की बात कही है।

फिलहाल दोनों पक्षों के बयानों के बाद यह मुद्दा सार्वजनिक चर्चा में है। ऐसे मामलों में अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के बीच संवाद और संवैधानिक अधिकारों को समझना महत्वपूर्ण माना जाता है।

3 सितंबर 2026 | digitallivenews.com

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