अमेरिकी टैरिफ पर भारत में विवाद

Report By: Kiran Prakash Singh

नई दिल्ली, (digitallivenews)।


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कुछ भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाए जाने के फैसले के बाद भारत में राजनीतिक और आर्थिक बहस तेज हो गई है। इस फैसले को लेकर जहां विपक्षी दल मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं उद्योग विशेषज्ञ इस प्रभाव को लेकर बंटी हुई राय दे रहे हैं।

विपक्ष का हमला: विदेश नीति की विफलता का नतीजा

विपक्षी दलों ने टैरिफ को मोदी सरकार की कथित कमजोर विदेश नीति का परिणाम बताया है। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि “हाउडी मोदी” और “नमस्ते ट्रंप” जैसे भव्य आयोजनों के बावजूद भारत को अमेरिका से कोई ठोस लाभ नहीं मिल पाया है। उन्होंने विदेश मंत्रालय पर अहंकार और अमेरिका से समन्वय की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे खासतौर पर उन उद्योगों पर असर पड़ेगा, जहां बड़ी संख्या में लोग रोजगार में हैं।

गोगोई समेत विपक्ष ने सरकार से मांग की है कि वह सिर्फ बयानबाज़ी न करे, बल्कि जवाबी टैरिफ जैसे ठोस कदम उठाए, जिससे भारतीय उद्योगों को सुरक्षा मिल सके।

उद्योग जगत की राय: असर सीमित, मौके भी मिल सकते हैं

इस मुद्दे पर भारतीय चावल निर्यातक संघ (IREF) के उपाध्यक्ष देव गर्ग की राय कुछ अलग है। उनके अनुसार, टैरिफ का असली बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ेगा क्योंकि वे अपनी खाने की आदतें आसानी से नहीं बदलते। उन्होंने कहा कि भारत के निर्यातकों को इससे नुकसान कम और अवसर ज्यादा मिल सकते हैं, खासकर नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रवेश करने का।

गर्ग ने यह भी बताया कि 27 अगस्त की समय सीमा से पहले पहले ही भारी मात्रा में निर्यात हो चुका है, इसलिए आने वाले महीनों—नवंबर और दिसंबर—में निर्यात पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।

MSME पर दबाव: कौशल विकास की जरूरत

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के महानिदेशक और CEO डॉ. अजय सहाय ने इस टैरिफ का सबसे गहरा असर भारत के छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) पर बताया है। उनके मुताबिक, यह टैरिफ भारत के लगभग 55% निर्यात पर लागू होता है, विशेष रूप से स्टील और एल्युमिनियम जैसे उत्पादों पर।

डॉ. सहाय ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वो कर्मचारियों को फिर से कौशल प्रशिक्षण देने के लिए विशेष फंड आवंटित करे ताकि रोजगार बना रहे। उन्होंने इसे अस्थायी संकट बताते हुए कहा कि “यदि सरकार सही समय पर हस्तक्षेप करती है, तो यह अवसर में बदला जा सकता है।”


निष्कर्ष: नीति, रणनीति और समन्वय की परीक्षा

अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ ने भारत की विदेश नीति, व्यापार रणनीति और औद्योगिक संरचना की मजबूती की असल परीक्षा ले ली है। जहां एक ओर यह सरकार के लिए एक चुनौती है, वहीं यह उद्योगों के लिए खुद को पुनः स्थापित करने और नए बाजारों में उतरने का मौका भी बन सकता है।

अब देखना यह है कि भारत इस स्थिति को किस तरह संभालता है—जवाबी कार्रवाई से, कूटनीति से, या रणनीतिक व्यापार नीति से।

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