“कांवड़ यात्रा मार्ग पर QR‑कोड आदेश बरकरार: SC ने कहा ‘उपभोक्ता सर्वोपरि’, होटल मालिकों को लाइसेंस‑पंजीकरण जरूर दिखाएँ”

 

Report By: Kiran Prakash Singh

 

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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों/ढाबों को क्यूआर कोड प्रदर्शित करने के निर्देश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, अदालत ने कहा कि उपभोक्ता ही सर्वोपरि है और उसे सोच-समझकर भोजन चुनने की अनुमति दी जानी चाहिए |

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (22 जुलाई) को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित ढाबों/भोजनालयों को क्यूआर कोड प्रदर्शित करने के निर्देश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, अदालत ने कहा कि उपभोक्ता ही सर्वोपरि है और उसे सोच-समझकर भोजन चुनने की अनुमति दी जानी चाहिए |

 

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने होटल मालिकों को खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम (एफएसएसए), 2006 के तहत आवश्यक लाइसेंस और पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदर्शित करने का निर्देश दिया. साथ ही इस आदेश के अनुपालन के लिए मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की |

मामले पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा, ‘श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए, साथ ही दुकानदारों की आजीविका भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए,अदालत को संतुलन बनाना होगा |

अदालत इस बात से सहमत नज़र आई कि उपभोक्ताओं को यह चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए कि वे यात्रा के दौरान शुद्ध शाकाहारी होटल में खाना पसंद करेंगे या शाकाहारी भोजन परोसने वाले होटल में |

अदालत ने आगे कहा, ‘हमें उपभोक्ताओं की चिंता है. यह उनकी पसंद होनी चाहिए. क्योंकि आखिरकार उपभोक्ता ही सर्वोपरि है. हमें उपभोक्ताओं के हितों को प्राथमिकता देनी होगी.’

जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के 25 जून के उस प्रेस नोट को चुनौती दी गई थी, जिसमें कांवड़ यात्रा मार्ग पर खाद्य विक्रेताओं को क्यूआर कोड प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया था. इसमें भोजनालय के स्वामित्व का विवरण और अन्य कानूनी अनुपालन शामिल थे.

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा जारी नियम क्यूआर कोडिंग की अनुमति नहीं देते हैं. उन्होंने शीर्ष अदालत के 22 जुलाई, 2024 के एक आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें पिछले साल उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा जारी इसी तरह के एक आदेश पर रोक लगा दी गई थी, जिसमें रेस्तरां मालिकों को अपनी और अपने कर्मचारियों के नाम दुकान के सामने प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया था.

इन आवेदनों में दावा किया गया था कि उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) आयुक्त द्वारा जारी वर्तमान आदेश क्यूआर कोड की अनिवार्यता लागू करके सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को ‘खत्म’ करने का एक प्रयास है.

इस मामले पर प्रो. अपूर्वानंद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने यह स्पष्टीकरण मांगा कि क्यूआर कोड पर मालिकों का नाम प्रदर्शित करना ज़रूरी नहीं है, तो पीठ ने कहा, ‘ये सभी मुद्दे खुले हैं, हम इस पर विचार नहीं कर रहे हैं, आप इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं. किसी भी स्थिति में यह निरर्थक है… हमें सूचित किया गया है कि आज यात्रा का अंतिम दिन है और किसी भी स्थिति में यह निकट भविष्य में समाप्त होने की संभावना है |

अदालत ने आगे कहा, ‘इस स्तर पर हम केवल एक आदेश पारित करते हैं कि सभी होटल मालिक वैधानिक रूप से आवश्यक लाइसेंस और पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदर्शित करने के आदेश का पालन करेंगे.’

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि क्यूआर कोड की अनिवार्यता एफएसएसए के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी की गई है. राज्य सरकार ने दलील दी कि एक भी प्रभावित दुकानदार ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया और याचिकाकर्ताओं के राज्य के निर्देश को चुनौती देने के अधिकार पर सवाल उठाया.

रोहतगी ने कहा, ‘ये श्रद्धालु बेहद भावुक हैं. वे उस दुकान से खाना नहीं खाना चाहेंगे जो एक महीने पहले तक उन्हीं बर्तनों में मांसाहारी खाना परोसती थी |

आवेदकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, ‘यह सब पहचान की राजनीति है , इस यात्रा के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय को बहिष्कृत करने की यह सबसे विभाजनकारी नीति है. जो उन्हें अलग-थलग कर देती है, यह पहचान के विभाजन के बीज बोती है, धर्मनिरपेक्षता पर सीधा हमला है और अपने आप में असंवैधानिक है, जो समानता के अधिकार, पेशे के अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(जी) और 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है.’

उन्होंने बताया कि साल के इस समय में कांवड़ मार्ग पर सभी दुकानें केवल शाकाहारी भोजन ही बेचती हैं, सिंघवी ने आगे कहा, ‘आप किसी भोजन का बहिष्कार उसके मेनू कार्ड के आधार पर कर सकते हैं, मालिक की पहचान के आधार पर नहीं…’

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