
Report By: Kiran Prakash Singh
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक MLC सीट पर सपा के टिकट बदलाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कमलेश यादव की जगह डॉ. संजयन त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाने के बाद समर्थकों की नाराजगी और निर्दलीय रंजीत यादव को मिले समर्थन की चर्चा है।
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गोरखपुर MLC चुनाव में संजयन त्रिपाठी तीसरे नंबर पर, कमलेश यादव का टिकट कटने से बिगड़ा सपा का गणित?
Digital Live News | 28 अक्टूबर 2026 | digitallivenews.com
उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव में गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला समाजवादी पार्टी के लिए चर्चा का विषय बन गया है। पार्टी ने पहले कमलेश यादव को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन 3 अक्टूबर को उनका टिकट काटकर डॉ. संजयन त्रिपाठी को प्रत्याशी घोषित कर दिया। चुनाव के बाद इस फैसले और इसके संभावित असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संजयन त्रिपाठी तीसरे स्थान पर रहे, जबकि बीजेपी के ध्रुव कुमार त्रिपाठी और निर्दलीय प्रत्याशी रंजीत यादव के बीच मुख्य मुकाबला बताया गया। कमलेश यादव के समर्थकों की नाराजगी को भी सपा के प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, वोटों के स्थानांतरण और चुनाव परिणाम पर टिकट बदलने के वास्तविक प्रभाव की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
1. आखिरी समय में बदला गया सपा का टिकट
समाजवादी पार्टी ने शुरुआत में गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक सीट से कमलेश यादव को प्रत्याशी बनाया था। बाद में पार्टी ने उनका टिकट काटकर डॉ. संजयन त्रिपाठी को मैदान में उतार दिया।
इस बदलाव के बाद कमलेश यादव के समर्थकों में नाराजगी की बात सामने आई। पार्टी से जुड़े एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर दावा किया कि कमलेश यादव ने कई जिलों में शिक्षकों के बीच लंबे समय तक काम करके अपना समर्थन तैयार किया था।
उनके अनुसार, अंतिम समय में टिकट बदलने से उन समर्थकों को झटका लगा, जो कमलेश यादव की उम्मीदवारी के लिए मेहनत कर रहे थे। हालांकि, यह समर्थकों की ओर से सामने आया दावा है; सभी मतदाताओं के मतदान व्यवहार के बारे में इससे निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
2. ध्रुव कुमार त्रिपाठी और रंजीत यादव के बीच मुकाबला
गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक सीट पर चुनाव से पहले बीजेपी के ध्रुव कुमार त्रिपाठी और सपा के डॉ. संजयन त्रिपाठी के बीच मुकाबले की चर्चा थी। लेकिन उपलब्ध विवरण के अनुसार, मतगणना के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी रंजीत यादव भी प्रमुख दावेदार के रूप में सामने आए।
राजनीतिक चर्चा में यह दावा किया जा रहा है कि कमलेश यादव के कुछ समर्थकों ने सपा के नए प्रत्याशी के बजाय रंजीत यादव का समर्थन किया। हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए बूथवार मतदान के आंकड़े या समर्थकों के मतदान व्यवहार से जुड़ा विश्वसनीय डेटा जरूरी होगा।
3. PDA की रणनीति पर उठे सवाल
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की राजनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग का गठजोड़ महत्वपूर्ण रहा है। गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर उम्मीदवार बदलने के फैसले के बाद पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
कमलेश यादव के समर्थकों का दावा है कि उनके पास माध्यमिक शिक्षा क्षेत्र, मदरसा बोर्ड, CBSE शिक्षकों और यादव समुदाय के मतदाताओं का समर्थन था। उनका यह भी कहना है कि कमलेश यादव ने वर्षों की मेहनत से व्यक्तिगत संपर्क और समर्थन तैयार किया था।
इन समर्थकों के अनुसार, टिकट बदलने के बाद कुछ मतदाता निर्दलीय रंजीत यादव की ओर चले गए। लेकिन यह कहना कि PDA से जुड़े सभी या अधिकांश वोट रंजीत यादव को मिले, उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रमाणित नहीं है।
4. संजयन त्रिपाठी की उम्मीदवारी पर चर्चा
डॉ. संजयन त्रिपाठी को टिकट देने के फैसले ने चुनाव के बाद पार्टी के भीतर उम्मीदवार चयन की रणनीति पर बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक विश्लेषण में उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, शिक्षकों के बीच संपर्क, संगठन की सक्रियता और चुनाव प्रचार जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं।
कमलेश यादव के समर्थकों का आरोप है कि लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता की जगह दूसरे दल से आए नेता को टिकट देना उनके लिए निराशाजनक रहा। हालांकि, संजयन त्रिपाठी को टिकट देने के पीछे पार्टी नेतृत्व की पूरी रणनीति और फैसले के कारणों पर विस्तृत आधिकारिक पक्ष उपलब्ध होने पर ही तस्वीर साफ होगी।
5. टिकट बदलाव से क्या सीख मिलती है?
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक MLC चुनाव ने उम्मीदवार चयन, स्थानीय संगठन और समर्थकों की भूमिका पर चर्चा को बढ़ाया है। इस मामले में टिकट बदलने और समर्थकों की कथित नाराजगी को सपा के प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है।
फिर भी, किसी एक फैसले को चुनावी नतीजे का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा। मतदाताओं की पसंद, उम्मीदवारों की छवि, स्थानीय मुद्दे और चुनावी समीकरण भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
फिलहाल इस सीट पर सपा के उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कमलेश यादव के टिकट कटने से कितने मतदाता प्रभावित हुए और इसका परिणाम पर कितना असर पड़ा, इसका आकलन आधिकारिक मतगणना के विस्तृत आंकड़ों और संबंधित पक्षों के बयानों के आधार पर ही किया जा सकता है।
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