
Report By: Kiran Prakash Singh
जामिया में छात्र संघ चुनाव की मांग के बीच कथित विवादित नारों पर विवाद बढ़ा। इमरान मसूद को हिरासत में लिए जाने और BJP-कांग्रेस के बयानों से सियासी घमासान तेज हुआ।
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जामिया में क्यों मचा बवाल? छात्र संघ चुनाव की मांग के बीच विवादित नारों पर सियासत तेज
Digital Live News | 24 अक्टूबर 2026 | digitallivenews.com
दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव कराने की मांग को लेकर जारी आंदोलन अब कथित विवादित नारों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच घिर गया है। विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर आपत्तिजनक नारे लिखे जाने की खबर के बाद प्रशासन, छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इसी बीच
मसूद ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान ‘आजाद कश्मीर’ के समर्थन में कोई नारा नहीं लगाया गया। उन्होंने ऐसे नारों का समर्थन नहीं करने और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने की बात कही। दूसरी ओर, BJP और ABVP से जुड़े नेताओं ने कथित विवादित नारों की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
1. जामिया की दीवारों पर कथित विवादित नारे, जांच की मांग
जामिया परिसर की दीवारों पर कथित आपत्तिजनक और भारत-विरोधी नारे लिखे जाने का मामला सामने आने के बाद विवाद बढ़ गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने घटना की निंदा करते हुए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई करने की बात कही है।
रिपोर्टों के मुताबिक, दीवारों पर लिखे नारों को बाद में हटा दिया गया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि नारे किसने लिखे और इस मामले में किसी व्यक्ति की पहचान की गई है या नहीं।
प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि इस विवाद के जरिए छात्र संघ चुनाव की मांग से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में मामले की निष्पक्ष जांच और तथ्यों का सामने आना महत्वपूर्ण है।
2. छात्र संघ चुनाव की मांग पर अड़े प्रदर्शनकारी
जामिया में छात्र संघ चुनाव कराने की मांग लंबे समय से उठ रही है। फिलहाल यूनाइटेड स्टूडेंट्स ऑफ जामिया के बैनर तले छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी प्रमुख मांग है कि मौजूदा शैक्षणिक सत्र में चुनाव की तारीख घोषित की जाए।
प्रदर्शनकारी छात्रों ने तीन मुख्य मांगें रखी हैं:
- छात्र संघ चुनाव की तारीख जल्द घोषित की जाए।
- प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस ली जाए।
- सिक्योरिटी एडवाइजर और चीफ प्रॉक्टर को उनके पदों से हटाया जाए।
छात्रों का कहना है कि छात्र संघ विद्यार्थियों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने और उनके प्रतिनिधित्व का लोकतांत्रिक माध्यम है। इसलिए इसकी बहाली में और देरी नहीं होनी चाहिए।
3. हाईलेवल कमेटी ने क्या जवाब दिया?
छात्रों की मांगों पर विश्वविद्यालय की हाईलेवल कमेटी ने बताया कि छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए एक ड्राफ्ट कमेटी गठित की गई है। प्रशासन का तर्क है कि चुनाव कराने से पहले छात्र संघ का संविधान और आवश्यक नियम तय करना जरूरी है।
कमेटी ने यह भी कहा कि 12 अक्टूबर के बाद की गई अनुशासनात्मक कार्रवाइयों की समीक्षा की जाएगी। साथ ही छात्रों से प्रदर्शन समाप्त करने और चुनाव की प्रक्रिया में सहयोग करने की अपील की गई है।
हालांकि, प्रदर्शनकारी इस जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि प्रशासन ने संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए लगभग दो महीने का समय बताया है, लेकिन चुनाव की निश्चित तारीख नहीं दी गई। छात्रों का सवाल है कि जब चुनाव उनकी मुख्य मांग है, तो प्रशासन को इसकी समयसीमा भी स्पष्ट करनी चाहिए।
4. 13 दिनों की भूख हड़ताल का दावा, छात्रों ने मांगा हस्तक्षेप
छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर कुछ प्रदर्शनकारी भूख हड़ताल पर भी बैठे हैं। छात्र जासिम अली खान ने दावा किया कि वह 13 दिनों से भूख हड़ताल कर रहे हैं।
जासिम के मुताबिक, प्रशासन की ओर से दी गई समयसीमा चुनाव कराने के लिए नहीं, बल्कि छात्र संघ के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए है। उन्होंने कहा कि छात्रों ने प्रशासन से प्रक्रिया जल्द पूरी करने की मांग की है और जरूरत पड़ने पर संविधान तैयार करने में सहयोग देने की पेशकश भी की है।
एक अन्य प्रदर्शनकारी छात्र ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और शिक्षा मंत्रालय से हस्तक्षेप करने की अपील की। छात्रों का कहना है कि उनकी मांगों पर जल्द फैसला होना चाहिए। भूख हड़ताल और लंबे आंदोलन के बीच प्रदर्शनकारियों की सेहत को लेकर भी चिंता महत्वपूर्ण है।
5. ABVP और VHP ने की कार्रवाई की मांग
दीवारों पर कथित विवादित नारे लिखे जाने के मामले में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। संगठन का कहना है कि छात्र संघ चुनाव की मांग लोकतांत्रिक तरीके से उठाई जानी चाहिए और किसी भी तरह की नफरत फैलाने वाली गतिविधि को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने भी घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से कथित भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों की पहचान कर कार्रवाई करने की मांग की।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी और शाहीन बाग आंदोलन का जिक्र करते हुए सवाल उठाए। इन बयानों के बाद मामला विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
6. इमरान मसूद ने क्या कहा, पुलिस ने क्यों हिरासत में लिया?
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद प्रदर्शनकारी छात्रों से मिलने जामिया पहुंचे थे। मुलाकात के बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए जाने की परिस्थितियों और पुलिस की ओर से बताए गए कारणों की विस्तृत पुष्टि के बिना किसी एक वजह को अंतिम रूप से बताना उचित नहीं होगा।
मसूद ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने छात्रों के सामने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया और ‘आजाद कश्मीर’ के समर्थन में नारे लगाए जाने से इनकार किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कश्मीर से जुड़े पोस्टर लगाने वाले लोग छात्र आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने ऐसे पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
इस बीच, एआईएमआईएम की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष डॉ. शोएब जमई ने भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। ये आरोप संबंधित नेताओं के बयान हैं; इनकी पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही हो सकेगी।
7. 2006 से छात्र संघ चुनाव नहीं होने का विवाद
जामिया में छात्र संघ चुनाव का मुद्दा कई वर्षों पुराना है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, विश्वविद्यालय में आखिरी बार 2005 में छात्र संघ चुनाव हुए थे। इसके बाद 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में हिंसा, अव्यवस्था और पढ़ाई प्रभावित होने का हवाला देते हुए चुनी हुई छात्र संघ इकाई को भंग कर दिया था।
इसके बाद अलग-अलग समय पर छात्र संघ की बहाली की मांग उठती रही। वर्ष 2012 में इस मुद्दे पर दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका भी दाखिल की गई थी। इसके बावजूद विश्वविद्यालय में नियमित छात्र संघ चुनाव बहाल नहीं हो सके।
इसी पृष्ठभूमि में मौजूदा आंदोलन के छात्र जल्द चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि छात्र संघ नहीं होने से विद्यार्थियों को अपनी सामूहिक समस्याएं उठाने और प्रशासन के सामने प्रतिनिधित्व करने का मंच नहीं मिल पाता।
फिलहाल जामिया का विवाद दो अलग-अलग सवालों पर केंद्रित है—पहला, छात्र संघ चुनाव कब और किस प्रक्रिया के तहत होंगे; दूसरा, दीवारों पर कथित विवादित नारे किसने लिखे और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। निष्पक्ष जांच, प्रशासन की स्पष्ट समयसीमा और छात्रों के साथ संवाद से ही इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
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