सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सेना की JAG ब्रांच में लैंगिक भेदभाव असंवैधानिक, सीटें आरक्षण नीति रद्द

Report By: Kiran Prakash Singh

नई दिल्ली,(digitaallivenews)11 अगस्त:


सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल (JAG) ब्रांच में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग सीटें आरक्षित करने की नीति को असंवैधानिक ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भर्ती में लैंगिक तटस्थता (gender neutrality) का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए और चयन का आधार केवल योग्यता होना चाहिए, न कि उम्मीदवार का लिंग।

फैसले की पृष्ठभूमि

यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस मनमोहन की अध्यक्षता वाली बेंच ने दो महिला याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनाया। याचिका में सेना की उस नीति को चुनौती दी गई थी, जिसमें JAG में पुरुषों के लिए 6 और महिलाओं के लिए केवल 3 सीटें निर्धारित की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह नीति संविधान के अनुच्छेद 14 में मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है और महिलाओं के अवसरों को अनुचित रूप से सीमित करती है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

कोर्ट ने कहा:

  • कार्यपालिका पुरुषों के लिए सीटें आरक्षित नहीं कर सकती।

  • सेना की यह नीति मनमानी है और यह भर्ती प्रक्रिया के पीछे छिपे भेदभाव को दर्शाती है।

  • लैंगिक तटस्थता का अर्थ यह है कि सबसे योग्य उम्मीदवार का चयन हो, चाहे वह पुरुष हो या महिला।

  • इस तरह की नीति राष्ट्र की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकती है।

क्या है JAG ब्रांच?

भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल (JAG) शाखा सेना की कानूनी इकाई है, जो अनुशासनात्मक कार्यवाही, कोर्ट मार्शल, संवैधानिक अधिकारों और सिविल-क्रिमिनल मामलों में कानूनी सलाह और प्रतिनिधित्व प्रदान करती है। इसमें शामिल होने के लिए लॉ ग्रैजुएट्स को JAG परीक्षा पास करनी होती है।

आगे का रास्ता

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सेना को निर्देश दिया है कि भविष्य में भर्ती के लिए संयुक्त मेरिट सूची (common merit list) तैयार की जाए, जिसमें पुरुष और महिला उम्मीदवारों का समान मूल्यांकन किया जाए। इससे सेना की भर्ती प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और संविधान सम्मत बन सकेगी।


निष्कर्ष

यह फैसला केवल सेना की भर्ती प्रक्रिया में बदलाव नहीं लाता, बल्कि देश के प्रत्येक क्षेत्र में लैंगिक समानता और योग्यता आधारित चयन के सिद्धांत को मजबूती देता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय समान अवसर और लैंगिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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