
Report By: Kiran Prakash Singh
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट तक पहुंच बच्चों के लिए भी मौलिक अधिकारों से जुड़ी है। कोर्ट ने ऑनलाइन सुरक्षा के लिए पैरेंटल निगरानी, प्राइवेट अकाउंट और हानिकारक सामग्री पर नियंत्रण जैसे उपाय सुझाए।
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बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना समाधान नहीं: सुप्रीम कोर्ट
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि इंटरनेट तक पहुंच बच्चों के लिए भी मौलिक अधिकारों से जुड़ी है और उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना उचित समाधान नहीं है। कोर्ट के मुताबिक, बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता दोनों जरूरी हैं और इनके बीच संतुलन बनाना होगा।
यह टिप्पणी सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने ऐसी सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने की व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश भी दिए।
1. इंटरनेट तक पहुंच मौलिक अधिकारों से जुड़ी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लेख करते हुए इंटरनेट की भूमिका को रेखांकित किया। अदालत के अनुसार, इंटरनेट जानकारी हासिल करने, विचार व्यक्त करने और रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
पीठ ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना ऑनलाइन खतरों का स्थायी समाधान नहीं है। इसके बजाय उन खतरों को रोकने और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने के लिए प्रभावी उपाय किए जाने चाहिए।
2. इंटरनेट पर प्रतिबंध से बढ़ सकती हैं मुश्किलें
अदालत ने चिंता जताई कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के अनचाहे परिणाम हो सकते हैं। प्रतिबंध के बावजूद बच्चे दूसरे या कम नियंत्रित प्लेटफॉर्म तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं, जहां उनकी सुरक्षा के जोखिम अधिक हो सकते हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि बच्चों को ऑनलाइन उत्पीड़न या शोषण का सामना करना पड़ता है, तो उन्हें इसकी जानकारी माता-पिता या किसी भरोसेमंद व्यक्ति को देने में डर महसूस हो सकता है। इसलिए ऐसा वातावरण बनाना जरूरी है, जिसमें बच्चे मदद मांग सकें और उनकी शिकायतों पर कार्रवाई हो।
3. दूरदराज के बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने का माध्यम
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट के शैक्षणिक और सामाजिक महत्व पर भी जोर दिया। अदालत के अनुसार, दूरदराज के इलाकों में रहने वाले कई बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने और जरूरी जानकारी हासिल करने का अहम साधन हो सकता है।
इंटरनेट विशेष जरूरतों वाले बच्चों को अपने जैसे अन्य लोगों से जुड़ने और जानकारी साझा करने का अवसर भी देता है। ऐसे में सभी बच्चों के लिए एक जैसा पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय उनकी उम्र, जरूरतों और सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखना जरूरी है।
4. पैरेंटल निगरानी और चाइल्ड मोड जैसे उपायों का सुझाव
पीठ ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कई उपायों का उल्लेख किया। इनमें उम्र के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था, सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए माता-पिता की सहमति और निगरानी तथा बच्चों के अकाउंट को डिफॉल्ट रूप से प्राइवेट रखने जैसे विकल्प शामिल हैं।
अदालत ने बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री और विज्ञापनों पर नियंत्रण तथा छोटे बच्चों के लिए अलग ‘चाइल्ड मोड’ की व्यवस्था पर भी विचार करने की बात कही।
पीठ ने स्पष्ट किया कि ये सुझाव हैं। इन्हें किस तरह लागू किया जाना चाहिए, इस पर उचित व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी। सरकार बच्चों को वयस्क सामग्री और अन्य हानिकारक ऑनलाइन सेवाओं से बचाने के लिए उपयुक्त प्रतिबंधों पर भी विचार कर सकती है।
5. बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री हटाने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री की पहचान करने तथा उसे हटाने की प्रक्रिया मजबूत करने के निर्देश दिए। इसके लिए ऐसा राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया, जिससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद अवैध सामग्री की पहचान और उसे हटाने में मदद मिल सके।
अदालत ने इस मुद्दे को केवल बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल तक सीमित न रखते हुए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और प्रभावी सुरक्षा उपायों से भी जोड़ा।
6. पुराने फैसलों का भी किया उल्लेख
पीठ ने अपने फैसले में 2020 के ‘अनुराधा भसीन’ और 2025 के ‘प्रज्ञा प्रसून’ मामलों का भी जिक्र किया। इन फैसलों में इंटरनेट तक पहुंच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल पहुंच से जुड़े पहलुओं पर विचार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी का मुख्य संदेश यह है कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए केवल इंटरनेट पर रोक लगाना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ सुरक्षित डिजिटल वातावरण, माता-पिता की उचित निगरानी, हानिकारक सामग्री पर नियंत्रण और शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है।
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