दिल्ली में पौधारोपण पर करोड़ों खर्च, PWD के पास नहीं हिसाब

Report By: Kiran Prakash Singh

दिल्ली PWD ने 2019 के बाद लगाए गए लाखों पौधों का थर्ड पार्टी ऑडिट नहीं कराया। करोड़ों खर्च के बावजूद पेड़ों का कोई रिकॉर्ड नहीं।

Date: 18 May 2026
Website: DigitalLiveNews.com

दिल्ली में हरियाली के नाम पर करोड़ों खर्च, लगाए गए पेड़ों का नहीं कोई हिसाब

PWD पर उठे बड़े सवाल

राजधानी दिल्ली में हरियाली बढ़ाने और सड़कों को हरा-भरा बनाने के दावे अब सवालों के घेरे में आ गए हैं। लोक निर्माण विभाग यानी PWD पर आरोप है कि उसने साल 2019 के बाद सड़कों के किनारे लगाए गए लाखों पौधों और पेड़ों का कोई थर्ड पार्टी ऑडिट नहीं कराया।
इस खुलासे के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद कितने पौधे जीवित बचे और कितने सूख गए। सबसे बड़ी बात यह है कि विभाग के पास इसका कोई स्पष्ट और आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

हरियाली के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च

पिछले पांच वर्षों में दिल्ली की प्रमुख सड़कों और इलाकों में बड़े स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाए गए। विभाग की ओर से लाखों पौधे लगाने का दावा किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर इन पौधों की वास्तविक स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया गया।
जानकारों का कहना है कि पर्यावरण सुधार के नाम पर सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन यह नहीं बताया गया कि लगाए गए पौधों में से कितने आज भी जीवित हैं। ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि कहीं सरकारी धन का दुरुपयोग तो नहीं हुआ।

थर्ड पार्टी ऑडिट न होने से बढ़ा शक

नियमों के अनुसार, पौधारोपण के बाद उनकी सरवाइवल रेट जांचने के लिए स्वतंत्र एजेंसी द्वारा थर्ड पार्टी ऑडिट कराना जरूरी होता है। इस प्रक्रिया में हर पौधे की जियो-टैगिंग और भौतिक सत्यापन किया जाता है।
यदि पौधे सूख जाते हैं या उनकी देखभाल में लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित ठेकेदार या अधिकारी पर कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन दिल्ली PWD ने पिछले कई वर्षों से यह प्रक्रिया ही नहीं कराई।
सूत्रों का दावा है कि विभाग के कुछ अधिकारी जानबूझकर ऑडिट से बच रहे हैं। इससे भ्रष्टाचार और फर्जी भुगतान की आशंकाएं भी बढ़ गई हैं।

विशेषज्ञों ने जताई चिंता

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली जैसे प्रदूषण प्रभावित शहर में हरियाली बढ़ाना बेहद जरूरी है। हर साल मानसून के दौरान लाखों पौधे लगाने की घोषणाएं होती हैं, लेकिन उनकी देखरेख पर गंभीरता नहीं दिखाई जाती।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अधिकतर पौधे पर्याप्त पानी, खाद और रखरखाव के अभाव में कुछ ही महीनों में सूख जाते हैं। यदि समय-समय पर ऑडिट होता, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जा सकती थी।
उनका मानना है कि बिना निगरानी के चल रही यह व्यवस्था सरकारी खजाने पर बोझ डाल रही है और पर्यावरण सुधार के प्रयासों को कमजोर कर रही है।

जवाबदेही तय करने की उठी मांग

इस मामले के सामने आने के बाद अब PWD अधिकारियों और संबंधित ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने की मांग तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सरकार से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है।
लोगों का कहना है कि जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले अभियानों में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। यदि लाखों पौधे लगाने का दावा किया गया है, तो उनके जीवित रहने का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक होना चाहिए।
अब देखना होगा कि सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है और क्या भविष्य में पौधारोपण अभियानों की निगरानी के लिए सख्त व्यवस्था लागू की जाएगी।

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