
Report By: Kiran Prakash Singh
गोवा SIR मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने ECI से पूछा कि योग्य मतदाता बाहर हो जाएं तो SIR का क्या मतलब है। कोर्ट ने Form 8 और Form 6 को लेकर भी सवाल उठाए।
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SIR में मतदाताओं के नाम हटाने पर बॉम्बे HC ने ECI से पूछे सवाल
Digital Live News | 6 अक्टूबर 2026 | digitallivenews.com
गोवा में चल रही Special Intensive Revision यानी SIR प्रक्रिया को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने निर्वाचन आयोग से कई अहम सवाल पूछे हैं। 5 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने खास तौर पर उन मतदाताओं की स्थिति पर चिंता जताई, जिन्होंने अपना घर बदला है और मतदाता सूची में पता बदलने के लिए Form 8 जमा किया है।
मामला परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच अन्य सदस्यों से जुड़ा है। परिवार ने पता बदलने के लिए Form 8 का इस्तेमाल किया था, लेकिन SIR प्रक्रिया के दौरान उनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में नहीं दिखे। इसके बाद उन्हें Form 6 के जरिए नए सिरे से पंजीकरण कराने का विकल्प बताया गया।
1. Form 8 और Form 6 को लेकर क्या है विवाद?
Form 8 का इस्तेमाल मौजूदा मतदाता के पता बदलने या विवरण में संशोधन के लिए किया जाता है, जबकि Form 6 नए मतदाता के पंजीकरण के लिए होता है।
सालगांवकर परिवार का कहना है कि उन्होंने अपना पता बदलने के लिए Form 8 जमा किया था। लेकिन उनका नाम ड्राफ्ट रोल से हटाए जाने के बाद अधिकारियों की ओर से Form 6 भरने का विकल्प बताया गया।
हाईकोर्ट ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति पुराने पते पर अब रहता ही नहीं है, तो उससे उस पते पर रहने की घोषणा वाला फॉर्म भरने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। कोर्ट ने ऐसी स्थिति को ‘Catch-22’ बताया, यानी ऐसा चक्र जिसमें मतदाता के सामने कोई स्पष्ट कानूनी रास्ता नहीं बचता।
2. Rule 21 और मौजूदा वोटर लिस्ट पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने Registration of Electors Rules, 1960 के Rule 21 का भी उल्लेख किया। बेंच ने कहा कि नाम हटाने की प्रक्रिया में मौजूदा मतदाता सूची को ध्यान में रखना जरूरी है।
कोर्ट के अनुसार SIR के दौरान तैयार किया जा रहा ड्राफ्ट रोल अंतिम सूची नहीं है। इसलिए केवल ड्राफ्ट रोल के आधार पर किसी व्यक्ति को मौजूदा मतदाता सूची से बाहर करने की प्रक्रिया पर अदालत ने सवाल उठाए।
बेंच ने यह भी पूछा कि यदि किसी मतदाता का नाम हटाया जा रहा है तो उसे पहले नोटिस और सुनवाई का अवसर क्यों नहीं दिया गया। ECI की ओर से कहा गया कि नोटिस बोर्ड पर सूचना प्रकाशित की गई थी, क्योंकि आयोग के पास मतदाताओं के नए पते की जानकारी नहीं थी।
3. हाईकोर्ट ने पूछा- नागरिक बाहर हुए तो SIR का क्या मतलब?
कोर्ट ने SIR के उद्देश्य को लेकर भी निर्वाचन आयोग से सवाल किया। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी योग्य नागरिकों को मतदाता सूची में बनाए रखना भी है।
अदालत ने सवाल किया कि यदि SIR की प्रक्रिया में भारतीय नागरिक ही मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं, तो इस पूरी कवायद का उद्देश्य क्या रह जाता है।
यह टिप्पणी उस मामले में महत्वपूर्ण है जिसमें याचिकाकर्ता परिवार ने कहा है कि उन्होंने पता बदलने के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाई थी, लेकिन तकनीकी और प्रक्रियागत कारणों से उनके नाम सूची से बाहर हो गए।
4. ECI की दलील क्या है?
सुनवाई में निर्वाचन आयोग की ओर से अधिवक्ता गौरेश अग्नि ने आयोग की प्रक्रिया का पक्ष रखा। रिपोर्टों के मुताबिक ECI का कहना है कि SIR के दौरान नामों की प्रक्रिया अलग तरीके से चल रही है और जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट रोल में नहीं हैं, उनके लिए Form 6 के जरिए नए सिरे से शामिल होने का रास्ता उपलब्ध है।
हालांकि कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाया कि जिस व्यक्ति का केवल पता बदला है, उसे नए मतदाता की तरह Form 6 भरने के लिए क्यों कहा जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी फॉर्म में व्यक्ति को ऐसी घोषणा करनी पड़े जो उसकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती, तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मामले की सुनवाई 6 अक्टूबर को आगे जारी रहने की बात रिपोर्टों में कही गई है।
5. अब आगे क्या होगा?
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने फिलहाल मामले में अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। अदालत ने निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया और मतदाताओं के सामने पैदा हो रही स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
इस मामले का केंद्र मतदाता अधिकार, नाम हटाने की प्रक्रिया और SIR के दौरान पता बदलने वाले मतदाताओं के लिए उपलब्ध कानूनी रास्ता है। कोर्ट यह देख रहा है कि मौजूदा नियमों के तहत ऐसे मतदाताओं को पर्याप्त अवसर और उचित प्रक्रिया मिल रही है या नहीं।
परेश सालगांवकर मामले की सुनवाई आगे जारी रहने के साथ अब नजर इस बात पर है कि निर्वाचन आयोग Form 8, Form 6 और SIR के बीच पैदा हुई इस कथित Catch-22 स्थिति का क्या समाधान बताता है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रह सकता। यदि पता बदलने वाले मतदाताओं के लिए प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती, तो भविष्य में इसी तरह की परिस्थितियों में अन्य मतदाताओं के सामने भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
दिनांक: 6 अक्टूबर 2026
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